erere | Source: eereभारतीय भोजन में दाल को बेहद महत्वपूर्ण स्थान हासिल है। यह खासतौर पर शाकाहारी भोजन करने वाले लोगों के लिए प्रोटीन का एक लोकप्रिय और आसानी से उपलब्ध स्रोत मानी जाती है। इसके अलावा दाल में फाइबर समेत कई पोषक तत्व भी पाए जाते हैं। हालांकि, बाजार में उपलब्ध अलग-अलग दालों के पोषण गुण एक जैसे नहीं होते और शरीर की जरूरत के अनुसार किसी खास दाल को चुनना अधिक उपयोगी हो सकता है।

डॉ. पूजा रेड्डी ने अपने इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए अलग-अलग दालों से जुड़ी एक गाइड साझा की है। इसमें उन्होंने बताया है कि पाचन संबंधी परेशानी, प्रोटीन की जरूरत, डायबिटीज या अधिक फाइबर की आवश्यकता होने पर किस तरह की दाल को प्राथमिकता दी जा सकती है। डॉक्टर के अनुसार, दाल का चुनाव करने के साथ-साथ उसे भिगोने और अच्छी तरह पकाने का तरीका भी महत्वपूर्ण है।

पेट और पाचन की समस्या में पीली मूंग दाल का विकल्प

अगर किसी व्यक्ति को पाचन से जुड़ी परेशानी रहती है या भोजन करने के बाद पेट में भारीपन महसूस होता है, तो डॉ. पूजा रेड्डी के अनुसार पीली मूंग दाल एक बेहतर विकल्प हो सकती है। यह धुली हुई और छिलका उतरी हुई दाल होती है, जिसके कारण इसे पचाना अपेक्षाकृत आसान माना जाता है।

पीली मूंग दाल को भोजन में शामिल करना उन लोगों के लिए उपयोगी विकल्प हो सकता है जिन्हें दाल खाने के बाद भारीपन या पाचन संबंधी असहजता महसूस होती है। डॉक्टर की साझा की गई गाइड में इसे पेट के लिए अपेक्षाकृत हल्की दाल के तौर पर बताया गया है।

प्रोटीन बढ़ाना है तो मसूर दाल पर दें ध्यान

अगर दाल खाने का मुख्य उद्देश्य भोजन में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाना है, तो मसूर दाल एक अच्छा विकल्प हो सकती है। डॉ. पूजा रेड्डी के अनुसार, 100 ग्राम मसूर दाल में करीब 24 ग्राम प्रोटीन मिल सकता है।

मसूर दाल की एक खास बात यह भी बताई गई है कि यह जल्दी पक जाती है और पचाने में भी अपेक्षाकृत आसान होती है। ऐसे लोगों के लिए भी यह विकल्प उपयोगी हो सकता है जिन्हें दाल खाने के बाद पेट में भारीपन महसूस होता है।

डायबिटीज और इंसुलिन रेजिस्टेंस में चना दाल का विकल्प

डॉ. पूजा रेड्डी की गाइड के अनुसार, डायबिटीज या इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या वाले लोगों के लिए चना दाल एक विकल्प हो सकती है। इसमें कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स होने की बात बताई गई है। साझा जानकारी में चना दाल का ग्लाइसेमिक इंडेक्स 8 बताया गया है।

ग्लाइसेमिक इंडेक्स किसी खाद्य पदार्थ के सेवन के बाद रक्त शर्करा पर उसके प्रभाव को समझने का एक पैमाना है। कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले खाद्य पदार्थ आम तौर पर रक्त शर्करा को अपेक्षाकृत धीरे प्रभावित करते हैं। हालांकि, डायबिटीज वाले लोगों को अपनी व्यक्तिगत डाइट और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार चिकित्सक या आहार विशेषज्ञ की सलाह को प्राथमिकता देनी चाहिए।

फाइबर की जरूरत है तो साबुत हरी मूंग हो सकती है बेहतर

जिन लोगों का ध्यान भोजन में फाइबर की मात्रा बढ़ाने पर है, उनके लिए साबुत हरी मूंग दाल एक अच्छा विकल्प बताई गई है। डॉक्टर के अनुसार, साबुत हरी मूंग फाइबर से भरपूर होती है और उड़द दाल की तुलना में पेट पर हल्की पड़ सकती है।

फाइबर पाचन तंत्र के लिए महत्वपूर्ण पोषक तत्व है और संतुलित आहार का हिस्सा माना जाता है। इसलिए भोजन में फाइबर बढ़ाने की जरूरत महसूस होने पर साबुत दालों को भी आहार का हिस्सा बनाया जा सकता है।

दाल बनाने से पहले भिगोना क्यों बताया गया जरूरी

डॉ. पूजा रेड्डी ने केवल दाल के चुनाव की जानकारी ही नहीं दी, बल्कि उसे तैयार करने के तरीके से जुड़ी तीन जरूरी बातें भी बताई हैं। उनके अनुसार, दाल को पकाने से पहले 6 से 8 घंटे तक भिगोकर रखना चाहिए।

बताया गया है कि भिगोने से दाल में मौजूद पेक्टिन और फाइटिक एसिड के टूटने की प्रक्रिया में मदद मिलती है। इससे पेट में गैस और ब्लोटिंग जैसी समस्या कम होने में मदद मिल सकती है। साथ ही दाल के पोषण को बनाए रखने के लिए सही तरीके से तैयार करना भी महत्वपूर्ण है।

अधपकी दाल खाने से बचें, अच्छी तरह पकाना जरूरी

दाल को पूरी तरह पकाकर ही खाना चाहिए। डॉक्टर के अनुसार, अधपकी दाल खाने से पेट में गैस की समस्या काफी बढ़ सकती है। इसलिए दाल बनाते समय यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि वह अच्छी तरह गल जाए और पूरी तरह पक जाए।

प्रेशर कुकर में दाल को अच्छी तरह पकाना इसके लिए एक आसान तरीका हो सकता है। खासतौर पर जिन लोगों को दाल खाने के बाद गैस या पेट फूलने की शिकायत होती है, उनके लिए दाल को पर्याप्त रूप से पकाना महत्वपूर्ण हो सकता है।

हींग और अदरक का तड़का भी बताया उपयोगी

डॉ. पूजा रेड्डी के अनुसार, दाल में थोड़ी मात्रा में हींग और अदरक का तड़का लगाया जा सकता है। साझा की गई जानकारी में इन दोनों को पाचन तंत्र के लिए आरामदायक बताया गया है।

हालांकि, किसी व्यक्ति को किसी खाद्य पदार्थ से एलर्जी, असहिष्णुता या कोई विशेष स्वास्थ्य समस्या है, तो उसे अपनी व्यक्तिगत स्थिति के अनुसार भोजन का चुनाव करना चाहिए। केवल किसी एक दाल को सभी लोगों के लिए सबसे बेहतर मानना उचित नहीं होगा।

आपकी जरूरत के हिसाब से बदल सकती है दाल की पसंद

दाल को केवल प्रोटीन का स्रोत मानकर किसी एक प्रकार की दाल को हर दिन चुनना जरूरी नहीं है। अलग-अलग दालों को भोजन में शामिल करने से आहार में विविधता लाई जा सकती है। पाचन संबंधी परेशानी में पीली मूंग, अधिक प्रोटीन के लिए मसूर, डायबिटीज या इंसुलिन रेजिस्टेंस की स्थिति में चना दाल और अधिक फाइबर के लिए साबुत हरी मूंग को डॉक्टर की गाइड में अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार विकल्प बताया गया है।

इससे यह समझना आसान होता है कि दाल का चुनाव केवल स्वाद या घर में उपलब्धता के आधार पर ही नहीं, बल्कि व्यक्ति की पोषण संबंधी जरूरत के अनुसार भी किया जा सकता है।

दाल से जुड़ी इन बातों को रखें ध्यान में

दाल को भोजन का हिस्सा बनाते समय उसे पर्याप्त समय तक भिगोना, पूरी तरह पकाना और अपनी पाचन क्षमता के अनुसार दाल चुनना महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि किसी व्यक्ति को लगातार गैस, पेट फूलने, अपच या भोजन के बाद भारीपन जैसी समस्या रहती है, तो केवल दाल बदलने के बजाय समस्या के कारण को समझना भी जरूरी है।

डायबिटीज, इंसुलिन रेजिस्टेंस या किसी अन्य चिकित्सकीय स्थिति वाले लोगों को अपनी नियमित डाइट में बड़ा बदलाव करने से पहले डॉक्टर या योग्य आहार विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए।