eere | Source: erereमुरैना। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के छिछावली गांव निवासी गिरवर सिंह तोमर की जिंदगी की कहानी किसी असाधारण संघर्ष से कम नहीं है। कभी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ के जवान रहे गिरवर सिंह को वर्ष 1999 में एक वरिष्ठ अधिकारी से विवाद के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। नौकरी छूटने के बाद उन्होंने ऐसा रास्ता चुना जिसकी शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। गिरवर सिंह ने संत का जीवन अपना लिया और मंदिरों में रहकर पूजा-पाठ तथा सेवा करने लगे। हालांकि वर्दी से दूर होने के बावजूद उन्होंने अपनी नौकरी वापस पाने की उम्मीद नहीं छोड़ी और बर्खास्तगी के खिलाफ कानूनी लड़ाई जारी रखी।

बचपन से था सेना में जाने का जुनून

गिरवर सिंह तोमर को किशोरावस्था से ही सेना और सुरक्षा बल में शामिल होकर देश सेवा करने का जुनून था। कड़ी मेहनत के बाद वर्ष 1991 में उनका चयन सीआरपीएफ में हुआ। सेवा में आने के बाद उन्होंने करीब आठ वर्षों तक बल में अपनी जिम्मेदारी निभाई। लेकिन वर्ष 1999 में एक वरिष्ठ अधिकारी के साथ हुए विवाद ने उनकी नौकरी की दिशा ही बदल दी। विवाद के बाद उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू हुई और आखिरकार 21 अक्टूबर 1999 को उन्हें सीआरपीएफ से बर्खास्त कर दिया गया।

नौकरी छूटी तो मंदिर में रहने लगे

बर्खास्तगी के बाद गिरवर सिंह के जीवन में मुश्किल दौर शुरू हुआ। नौकरी जाने के कारण वह मानसिक रूप से परेशान रहने लगे। कुछ समय तक परिवार के साथ रहने के बाद उन्होंने गांव से करीब एक किलोमीटर दूर स्थित बारहद्वारी मंदिर में रहना शुरू कर दिया। बताया जाता है कि उन्होंने करीब चार से पांच वर्ष तक बारहद्वारी मंदिर में रहकर समय बिताया। इसके बाद वह मुरैना के गुफा मंदिर पहुंचे और यहीं से उनके जीवन में एक नया अध्याय शुरू हुआ।

वर्दी छूटी, पहचान बन गई ‘गिरवरदास महाराज’

मंदिर में रहने के दौरान गिरवर सिंह धीरे-धीरे संत के रूप में जीवन बिताने लगे। मंदिर के मुख्य पुजारी ने उन्हें ‘गिरवरदास महाराज’ नाम दिया। इसके बाद इसी नाम से उनकी पहचान बनने लगी। पूजा-पाठ, धार्मिक गतिविधियों और मंदिर सेवा में उनका समय बीतने लगा। एक तरफ उन्होंने संत का जीवन अपना लिया था, वहीं दूसरी तरफ सीआरपीएफ से बर्खास्तगी के खिलाफ उनकी कानूनी लड़ाई लगातार जारी रही।

1999 में ही हाईकोर्ट पहुंचे थे

गिरवर सिंह ने बर्खास्तगी के खिलाफ वर्ष 1999 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले में लंबी कानूनी प्रक्रिया चली। वर्ष 2007 में अदालत ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। हालांकि इसके बाद सीआरपीएफ की ओर से मामले में स्थगन आदेश लिए जाने के कारण उनकी वापसी तत्काल नहीं हो सकी। इसके बाद उन्होंने डबल बेंच में अपील की और कानूनी प्रक्रिया कई वर्षों तक चलती रही।

अदालत के आदेश के बाद भी करना पड़ा इंतजार

गिरवर सिंह की 26 साल लंबी कानूनी लड़ाई का एक अहम पड़ाव 28 अगस्त 2025 को आया। अदालत ने सीआरपीएफ को निर्देश दिया कि तीन महीने के भीतर गिरवर सिंह को दोबारा सेवा में ज्वाइनिंग दी जाए। निर्धारित समय के भीतर ज्वाइनिंग नहीं मिलने के बाद उन्होंने फिर कानूनी प्रक्रिया का सहारा लिया। इतने लंबे समय तक मामला अदालत और विभागीय प्रक्रिया के बीच चलता रहा, लेकिन उन्होंने अपनी कोशिश नहीं छोड़ी।

26 अगस्त 2026 को आया जिंदगी बदल देने वाला आदेश

लंबे इंतजार और कानूनी संघर्ष के बाद आखिरकार 26 अगस्त 2026 को सीआरपीएफ ने 26 साल पुराने मामले में गिरवर सिंह को दोबारा सेवा में लेने का आदेश जारी कर दिया। उनके लिए यह केवल नौकरी में वापसी का आदेश नहीं था, बल्कि वर्षों पहले छूटी वर्दी और देश सेवा से दोबारा जुड़ने का अवसर भी था। उन्हें छत्तीसगढ़ के बीजापुर में तैनाती दी गई है।

संत के रूप में बिताए वर्षों के बाद फिर पहनेंगे वर्दी

गिरवर सिंह की कहानी इसलिए भी अलग है क्योंकि नौकरी से बर्खास्त होने के बाद उन्होंने अपना जीवन पूरी तरह बदल लिया था। एक समय जो व्यक्ति सीआरपीएफ की वर्दी पहनकर देश की सुरक्षा में अपनी भूमिका निभा रहा था, वही बाद में मंदिर में रहकर संत के रूप में जीवन बिताने लगा। अब 26 साल बाद उन्हें फिर उसी सेवा में लौटने का अवसर मिला है।

26 साल का संघर्ष बना मिसाल

गिरवर सिंह तोमर की कहानी केवल एक कर्मचारी की नौकरी में वापसी तक सीमित नहीं है। इसमें लंबे समय तक अपने अधिकार के लिए कानूनी रास्ते पर डटे रहने और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उम्मीद बनाए रखने की कहानी भी दिखाई देती है। नौकरी छूटने के बाद उन्होंने संत का जीवन स्वीकार किया, लेकिन अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ न्यायिक लड़ाई बंद नहीं की। वर्षों तक चली प्रक्रिया के बाद अदालत के आदेश और विभागीय कार्रवाई के जरिए आखिरकार उनकी सीआरपीएफ में वापसी का रास्ता खुला।

बीजापुर में फिर शुरू होगी सेवा

अब गिरवर सिंह तोमर के जीवन का एक नया दौर शुरू हो चुका है। 26 अगस्त 2026 को जारी आदेश के बाद उन्हें छत्तीसगढ़ के बीजापुर में पोस्टिंग मिली है। जिस वर्दी से उनका रिश्ता वर्ष 1999 में अचानक टूट गया था, उसी सेवा में वह 26 वर्ष बाद फिर लौट रहे हैं। कभी ‘गिरवर सिंह तोमर’ के नाम से सीआरपीएफ जवान रहे व्यक्ति की पहचान बाद में ‘गिरवरदास महाराज’ के रूप में बनी और अब वह दोबारा सुरक्षा बल की सेवा में लौट आए हैं।