नई तकनीक। जिस ईंट को हम आमतौर पर घर, दीवार या इमारत बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं, वही अब भविष्य में बिजली स्टोर करने वाली बैटरी का काम कर सकती है। सुनने में यह भले ही किसी विज्ञान-कथा जैसा लगे, लेकिन MIT के इंजीनियरों से जुड़ी डीप-टेक कंपनी Fourth Power ने ग्रेफाइट की ईंटों को हाई-टेम्परेचर थर्मल बैटरी के रूप में इस्तेमाल करने की तकनीक विकसित की है। इस प्रणाली में ग्रेफाइट की ईंटों को करीब 2,400 डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया जाता है। इतना अधिक तापमान पहुंचने पर ये ईंटें सुर्ख-सफेद होकर तेज रोशनी छोड़ने लगती हैं। इसी ऊर्जा को खास थर्मोफोटोवोल्टाइक यानी TPV सेल्स के माध्यम से दोबारा बिजली में बदला जाता है।
आखिर ईंट कैसे बन गई बिजली स्टोर करने वाली बैटरी?
इस तकनीक का मूल विचार अतिरिक्त बिजली को सीधे बैटरी में स्टोर करने के बजाय उसे अत्यधिक तापमान के रूप में सुरक्षित रखना है। जब बिजली ग्रिड में जरूरत से ज्यादा उपलब्ध होती है, तब हीटिंग एलीमेंट्स की मदद से ग्रेफाइट ब्रिक्स को अत्यधिक तापमान तक गर्म किया जाता है।
जब बाद में ग्रिड या किसी उपयोगकर्ता को बिजली की जरूरत पड़ती है, तो इस संग्रहित ऊष्मा का इस्तेमाल बिजली पैदा करने के लिए किया जाता है। यानी अतिरिक्त बिजली को पहले गर्मी में बदला जाता है और जरूरत पड़ने पर उसी गर्मी से वापस बिजली तैयार की जाती है। यही प्रक्रिया इस तकनीक को पारंपरिक बैटरी से अलग बनाती है।
2,400 डिग्री पर चमकने लगती हैं ग्रेफाइट की ईंटें
Fourth Power की प्रणाली में ग्रेफाइट की ईंटों को लगभग 2,400 डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया जाता है। इस तापमान पर ग्रेफाइट इतनी गर्म हो जाती है कि उससे अत्यधिक तेज रोशनी निकलने लगती है। इसके बाद इसी चमक और ऊष्मीय विकिरण को TPV सेल्स बिजली में परिवर्तित करते हैं।
सामान्य सोलर पैनल सूर्य से आने वाली रोशनी को बिजली में बदलते हैं, जबकि TPV सेल्स का काम इस मामले में अत्यधिक गर्म सामग्री से निकलने वाले प्रकाश और विकिरण से बिजली पैदा करना है। इस तरह यहां सूर्य की रोशनी के बजाय हजारों डिग्री तक गर्म की गई ग्रेफाइट ईंटों से निकलने वाली ऊर्जा बिजली उत्पादन का आधार बनती है।
पुरानी तकनीक की सबसे बड़ी कमजोरी को ऐसे किया दूर
इस तरह की उच्च तापमान वाली थर्मल ऊर्जा प्रणालियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उपकरणों का अत्यधिक गर्मी को सहन कर पाना रही है। पहले की कुछ तकनीकों में गर्म गैस या पिघले हुए नमक को धातु के पाइपों के जरिए प्रवाहित किया जाता था। लेकिन करीब 2,400 डिग्री सेल्सियस जैसे तापमान पर सामान्य धातु आधारित पाइपों के लिए लंबे समय तक काम करना मुश्किल हो सकता है।
Fourth Power ने इसी समस्या से निपटने के लिए सिस्टम की संरचना में बदलाव किया। कंपनी ने धातु के बजाय ग्रेफाइट से बने पाइपों का इस्तेमाल किया और उनमें तरल टिन प्रवाहित करने की व्यवस्था तैयार की।
ग्रेफाइट पाइप और तरल टिन का अनोखा मेल
इस तकनीक में तरल टिन को ग्रेफाइट पाइपों के भीतर प्रवाहित किया जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, टिन उच्च तापमान पर भी कार्बन के साथ प्रतिक्रिया नहीं करता। इससे अत्यधिक गर्मी के दौरान पाइपों के पिघलने या रासायनिक रूप से खराब होने का जोखिम कम करने में मदद मिलती है।
तकनीक की एक अन्य खासियत यह बताई गई है कि टिन 2,602 डिग्री सेल्सियस तक तरल अवस्था में रह सकता है। दूसरी ओर, ग्रेफाइट अत्यधिक तापमान पर कमजोर होने के बजाय उच्च तापमान को सहन करने की क्षमता के कारण इस तरह की प्रणाली के लिए उपयुक्त सामग्री बनता है।
पूरे सिस्टम को आर्गन गैस से भरे सुरक्षित चैंबर में सील किया गया है। Fourth Power के अनुसार, इस डिजाइन को लंबे समय तक संचालन के लिए तैयार किया गया है और यह 30 साल तक लगातार काम करने में सक्षम हो सकता है।
बिजली की जरूरत पड़ते ही गर्म टिन शुरू करता है असली खेल
जब बिजली की मांग बढ़ती है और ग्रिड को ऊर्जा की जरूरत होती है, तब गर्म किए गए ग्रेफाइट ब्रिक्स से ऊर्जा निकालने की प्रक्रिया शुरू होती है। इसके लिए करीब 2,400 डिग्री सेल्सियस तक गर्म तरल टिन को ग्रेफाइट ईंटों के बीच से पंप किया जाता है।
यह बेहद गर्म टिन जब सिस्टम में मौजूद TPV सेल्स के पास से गुजरता है, तो इससे निकलने वाली प्रचंड ऊष्मीय रोशनी को सेल्स बिजली में बदलने लगती हैं। इस प्रक्रिया में पहले से संग्रहित अतिरिक्त बिजली अप्रत्यक्ष रूप से फिर से विद्युत ऊर्जा के रूप में उपलब्ध हो जाती है।
यानी सिस्टम का पूरा चक्र कुछ इस तरह काम करता है—अतिरिक्त बिजली से ग्रेफाइट ईंटों को गर्म किया जाता है, ईंटों में ऊर्जा संग्रहित रहती है और जरूरत पड़ने पर उस ऊर्जा को TPV सेल्स के जरिए फिर बिजली में बदला जाता है।
100 मेगावॉट प्रति एकड़ की पावर डेंसिटी का दावा
Fourth Power के मुताबिक, इस तकनीक की एक बड़ी खासियत इसकी ऊर्जा घनत्व है। कंपनी का दावा है कि उसका सिस्टम 100 मेगावॉट प्रति एकड़ की पावर डेंसिटी देने में सक्षम है। तुलना में कंपनी के अनुसार, इससे पहले की ऐसी तकनीकें करीब 10 मेगावॉट प्रति एकड़ तक सीमित थीं।
यदि यह दावा व्यावहारिक स्तर पर उसी क्षमता के साथ सफल होता है, तो कम भूमि में बड़ी मात्रा में ऊर्जा को संग्रहित और उपलब्ध कराने की संभावना बन सकती है। खासकर ऐसे समय में जब नवीकरणीय ऊर्जा के साथ बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण की जरूरत बढ़ रही है, इस तरह की तकनीक पर ध्यान दिया जा रहा है।
24 घंटे में सिर्फ 1 प्रतिशत हीट लॉस का दावा
इस थर्मल बैटरी तकनीक की एक और महत्वपूर्ण विशेषता कम ऊष्मा हानि बताई गई है। Fourth Power के अनुसार, सिस्टम में 24 घंटे के दौरान केवल करीब 1 प्रतिशत हीट लॉस होता है। कम ऊर्जा हानि के कारण संग्रहित गर्मी को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
कंपनी का दावा है कि यही क्षमता इस प्रणाली को लंबे बैकअप के लिए उपयोगी बनाती है और यह 100 घंटे तक के बैकअप के लिए बेहतर विकल्प हो सकती है। हालांकि, किसी भी नई ऊर्जा तकनीक की वास्तविक उपयोगिता उसके बड़े पैमाने पर संचालन, लागत, विश्वसनीयता और व्यावसायिक तैनाती के परिणामों से ही स्पष्ट होगी।
नवीकरणीय ऊर्जा के लिए क्यों महत्वपूर्ण हो सकती है यह तकनीक?
सौर और पवन ऊर्जा की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक उनकी उपलब्धता का लगातार एक जैसा न रहना है। सूरज की रोशनी और हवा की उपलब्धता समय और मौसम के अनुसार बदलती रहती है। ऐसे में जब बिजली का उत्पादन मांग से अधिक हो, तो उस अतिरिक्त ऊर्जा को सुरक्षित रखने की जरूरत होती है।
हाई-टेम्परेचर थर्मल बैटरी जैसी प्रणालियां अतिरिक्त बिजली को गर्मी के रूप में संग्रहित करने का विकल्प देती हैं। बाद में मांग बढ़ने पर इसी संग्रहित ऊर्जा से दोबारा बिजली पैदा की जा सकती है। इस कारण लंबे समय तक ऊर्जा भंडारण की जरूरत वाले क्षेत्रों में ऐसी तकनीक भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
ईंट जैसी दिखने वाली तकनीक के पीछे हाई-टेक विज्ञान
पहली नजर में ग्रेफाइट की ईंटों का इस्तेमाल बेहद साधारण लग सकता है, लेकिन इनके पीछे अत्यधिक तापमान, तरल धातु, ग्रेफाइट पाइप और थर्मोफोटोवोल्टाइक सेल्स जैसी उन्नत तकनीकों का संयोजन है। यही संयोजन इस प्रणाली को सामान्य ईंट या पारंपरिक बैटरी से बिल्कुल अलग बनाता है।
Fourth Power की तकनीक यह दिखाती है कि ऊर्जा भंडारण के लिए हमेशा पारंपरिक बैटरी रसायन पर ही निर्भर रहना जरूरी नहीं है। अत्यधिक गर्मी को भी ऊर्जा के भंडारण का माध्यम बनाया जा सकता है और उपयुक्त तकनीक के जरिए बाद में उसे वापस बिजली में बदला जा सकता है।
भविष्य की ऊर्जा भंडारण तकनीक में बन सकती है नया विकल्प
ग्रेफाइट ब्रिक्स को 2,400 डिग्री सेल्सियस तक गर्म करके ऊर्जा संग्रहित करना और फिर TPV सेल्स की मदद से उस ऊर्जा को बिजली में बदलना एक अलग तरह का ऊर्जा भंडारण मॉडल प्रस्तुत करता है। Fourth Power के दावे के अनुसार, इसकी उच्च पावर डेंसिटी, कम हीट लॉस और लंबे बैकअप की क्षमता इसे बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण के लिए संभावित विकल्प बनाती है।
फिलहाल इस तकनीक की वास्तविक क्षमता और व्यावसायिक प्रभाव का आकलन इसके आगे के परीक्षण और बड़े स्तर पर इस्तेमाल के आधार पर होगा। लेकिन इतना जरूर है कि जिस ईंट को अब तक केवल निर्माण सामग्री माना जाता था, उसे अत्यधिक तापमान पर ऊर्जा के भंडारण और बिजली उत्पादन की तकनीक से जोड़ने का विचार ऊर्जा क्षेत्र में एक बेहद अलग और दिलचस्प दिशा प्रस्तुत करता है।
