आज के समय में छोटे बच्चे बहुत कम उम्र से ही मोबाइल और टीवी की स्क्रीन के संपर्क में आ रहे हैं। कई परिवारों में यह स्थिति बन जाती है कि बच्चा मोबाइल या टीवी पर कार्टून देखे बिना खाना खाने से ही मना कर देता है। शुरुआत में यह तरीका माता-पिता के लिए आसान लगता है, लेकिन धीरे-धीरे यही आदत स्क्रीन की लत में बदल जाती है। इसका असर केवल बच्चे की आंखों पर ही नहीं, बल्कि उसके मानसिक, सामाजिक और व्यवहारिक विकास पर भी पड़ सकता है। ऐसे में समय रहते इस आदत को बदलना बेहद जरूरी हो जाता है।
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कैसे शुरू हुई स्क्रीन की आदत
लेखिका के अनुसार उनकी तीन वर्ष की बेटी को भी मोबाइल और टीवी पर कार्टून देखने की आदत लग गई थी। स्थिति यह हो गई थी कि वह बिना स्क्रीन देखे खाने का एक निवाला भी नहीं खाती थी। शुरुआत में मोबाइल दिखाकर खाना खिलाना आसान लगा, लेकिन बाद में यह आदत चिंता का कारण बन गई। इसके बाद उन्होंने धैर्य के साथ कुछ छोटे-छोटे बदलाव किए, जिनसे धीरे-धीरे बेटी की स्क्रीन पर निर्भरता कम हो गई। अब वह बिना मोबाइल के आराम से खाना खा लेती है और पूरे दिन में केवल लगभग आधे घंटे ही टीवी देखती है।
स्क्रीन की लत क्यों बन रही है बड़ी समस्या
विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक मोबाइल या टीवी देखने से बच्चों की आंखों पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा उनकी एकाग्रता, सामाजिक व्यवहार और सीखने की क्षमता पर भी प्रभाव पड़ सकता है। कई बार बच्चे स्क्रीन के इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि मोबाइल न मिलने पर गुस्सा करना, रोना या चिड़चिड़ापन जैसी समस्याएं भी सामने आने लगती हैं। इसलिए माता-पिता को शुरुआत से ही संतुलित स्क्रीन टाइम की आदत विकसित करनी चाहिए।
पहला तरीका: बच्चों को रचनात्मक गतिविधियों में व्यस्त रखें
स्क्रीन की आदत कम करने के लिए सबसे पहले बच्चों को ऐसी गतिविधियों से जोड़ना जरूरी है, जिनमें उनकी रुचि बनी रहे। लेखिका ने अपनी बेटी को रंग भरने, क्ले, स्लाइम और अन्य रचनात्मक गतिविधियों में शामिल किया। इन गतिविधियों से बच्चे लंबे समय तक व्यस्त रहते हैं और उनकी कल्पनाशक्ति तथा रचनात्मक सोच भी विकसित होती है। यदि माता-पिता भी उनके साथ बैठकर कुछ नया बनाएं तो बच्चे का उत्साह और बढ़ जाता है।
दूसरा तरीका: खाना खिलाते समय कहानियां सुनाएं
खाना खिलाने के दौरान मोबाइल दिखाने के बजाय कहानी सुनाने का तरीका अपनाया जा सकता है। लेखिका बताती हैं कि वह अपनी बेटी को अपने बचपन के अनुभव, जंगल के जानवरों की कहानियां या देवी-देवताओं से जुड़ी रोचक बातें सुनाती हैं। कहानी सुनते-सुनते बच्ची आराम से पूरा खाना खा लेती है। इसके साथ ही खाने की प्लेट को रंग-बिरंगे और पौष्टिक खाद्य पदार्थों से आकर्षक बनाने की कोशिश भी की जाती है, जिससे बच्चे की रुचि भोजन में बनी रहती है।
तीसरा तरीका: आउटडोर गतिविधियों को बनाएं दिनचर्या का हिस्सा
बच्चे यदि लंबे समय तक घर के अंदर रहें तो वे जल्दी बोर हो सकते हैं और फिर उनका ध्यान मोबाइल की ओर जाता है। इस समस्या से बचने के लिए लेखिका ने अपनी बेटी की आउटडोर गतिविधियां बढ़ाईं। कभी उसे तैराकी के लिए ले गईं, कभी गेंद से खेलने का मौका दिया और रोजाना शाम को लगभग आधे घंटे साइकिल चलाने की आदत डाली। इससे बच्ची का समय खेल-कूद में बीतने लगा और स्क्रीन देखने की इच्छा स्वतः कम होने लगी।
चौथा तरीका: दिमागी खेलों से बढ़ाएं रुचि
मोबाइल की जगह ऐसे खेल बच्चों को दिए जा सकते हैं, जिनसे उनका मानसिक विकास भी हो। लेखिका ने बेटी को ब्लॉक, अल्फाबेट, नंबर और अन्य ब्रेन गेम्स दिए। शुरुआत में उन्होंने खुद उसके साथ बैठकर खेलना और सीखना शुरू किया। धीरे-धीरे बच्ची ने इन खेलों में रुचि लेना शुरू कर दिया और फिर वह स्वयं इन्हें खेलने लगी। इससे मोबाइल पर निर्भरता लगातार कम होती गई।
माता-पिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण
लेखिका का कहना है कि बच्चों की स्क्रीन की आदत छुड़ाने में माता-पिता का व्यवहार भी बहुत मायने रखता है। यदि बड़े हर समय मोबाइल का उपयोग करेंगे तो बच्चे भी उसी की नकल करेंगे। इसलिए उन्होंने स्वयं भी बेटी के सामने मोबाइल का इस्तेमाल बहुत सीमित कर दिया और केवल जरूरी काम होने पर ही फोन का उपयोग किया। यही बदलाव बच्चे के व्यवहार में भी दिखाई देने लगा।
धैर्य रखना है सबसे जरूरी
यदि माता-पिता दोनों कामकाजी हैं और बच्चे की देखभाल किसी अन्य सदस्य या देखरेख करने वाले व्यक्ति के जिम्मे रहती है, तो उन्हें भी इन तरीकों की जानकारी देना जरूरी है। सभी लोग एक जैसी दिनचर्या अपनाएंगे, तभी बच्चे की स्क्रीन की आदत धीरे-धीरे कम होगी। इस पूरी प्रक्रिया में जल्दबाजी के बजाय धैर्य और नियमित प्रयास सबसे अधिक जरूरी हैं।
बच्चों की स्क्रीन की लत एक दिन में नहीं बनती और न ही एक दिन में खत्म होती है। लेकिन यदि माता-पिता धैर्य के साथ रचनात्मक गतिविधियां, कहानी सुनाने की आदत, आउटडोर खेल और दिमागी खेलों को बच्चे की दिनचर्या का हिस्सा बनाएं तथा स्वयं भी सीमित स्क्रीन उपयोग का उदाहरण पेश करें, तो धीरे-धीरे बच्चे मोबाइल और टीवी पर निर्भर हुए बिना भी सामान्य रूप से खाना खाने और खेलने की आदत विकसित कर सकते हैं।
