देश में मानसून की दस्तक के साथ ही अल नीनो का खतरा भी गहराने लगा है। केंद्र सरकार ने देश के 197 ऐसे जिलों की पहचान की है जो अल नीनो के असर से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। मौसम विभाग पहले ही सामान्य से कमजोर मानसून की आशंका जता चुका है, ऐसे में खेती, जल संकट और खाद्य उत्पादन को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। हालात को देखते हुए सरकार ने राज्यों के साथ मिलकर एक बड़ा राहत और बचाव अभियान शुरू कर दिया है ताकि किसानों और कृषि क्षेत्र पर पड़ने वाले संभावित असर को कम किया जा सके।

197 जिलों की पहचान, सरकार हाई अलर्ट पर

कृषि मंत्रालय ने देशभर के 197 जिलों को अल नीनो के लिहाज से सबसे संवेदनशील श्रेणी में रखा है। इन जिलों में बारिश की कमी, सूखे जैसी स्थिति और फसलों को नुकसान पहुंचने का खतरा सबसे अधिक माना जा रहा है। केंद्रीय कृषि मंत्री ने साफ कहा है कि मंत्रालय लगातार स्थिति की निगरानी कर रहा है और हर सप्ताह समीक्षा बैठकें आयोजित की जा रही हैं। सरकार का मानना है कि समय रहते तैयारी कर ली जाए तो संभावित नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है। राज्यों को भी स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से रणनीति तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं।

आखिर क्या है अल नीनो और क्यों बढ़ती है चिंता?

अल नीनो प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में होने वाला एक प्राकृतिक बदलाव है, लेकिन इसका असर दुनिया भर के मौसम पर पड़ता है। भारत में इसका सबसे बड़ा प्रभाव मानसून पर देखने को मिलता है। आमतौर पर अल नीनो की स्थिति बनने पर मानसूनी बारिश कमजोर पड़ सकती है या उसका वितरण असमान हो सकता है। इसका सीधा असर खेती, जलाशयों के जलस्तर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अल नीनो मानसून के दूसरे हिस्से में और मजबूत होता है तो खरीफ फसलों के लिए चुनौती बढ़ सकती है।

कमजोर मानसून की आशंका ने बढ़ाई टेंशन

भारतीय मौसम विभाग ने इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून के सामान्य से कम रहने की संभावना जताई है। अनुमान है कि पूरे सीजन में बारिश दीर्घकालिक औसत के लगभग 90 प्रतिशत के आसपास रह सकती है। हालांकि मानसून ने केरल में प्रवेश कर लिया है और आगे बढ़ रहा है, लेकिन मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि असली परीक्षा जुलाई और अगस्त में होगी, जब देश के अधिकांश हिस्सों में खेती के लिए पर्याप्त बारिश की जरूरत होती है। यदि बारिश में लंबा अंतराल आता है तो बुआई और उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

सरकार का ‘ऑपरेशन राहत’, किसानों के लिए खास तैयारी

संभावित संकट को देखते हुए केंद्र सरकार ने कई स्तरों पर तैयारी शुरू कर दी है। राज्यों को जिला-स्तरीय कंटिजेंसी प्लान लागू करने के निर्देश दिए गए हैं। कम पानी में तैयार होने वाली फसलों को बढ़ावा देने, सूखा सहन करने वाले बीज उपलब्ध कराने, जल संरक्षण पर जोर देने और जरूरत पड़ने पर दोबारा बुआई की व्यवस्था करने की योजना बनाई गई है। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर बीज भंडार तैयार किया गया है ताकि किसी भी आपात स्थिति में किसानों को तुरंत सहायता मिल सके। कृषि मंत्रालय ‘खेत बचाओ अभियान’ के जरिए किसानों तक मौसम और खेती से जुड़ी सलाह भी पहुंचा रहा है।

किसानों और आम लोगों पर क्या होगा असर?

यदि अल नीनो का प्रभाव बढ़ता है और बारिश सामान्य से कम रहती है तो सबसे पहले असर खेती पर दिखाई देगा। धान, दालें, तिलहन और अन्य खरीफ फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। इससे खाद्यान्न उत्पादन घटने और खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका भी पैदा हो सकती है। दूसरी ओर जलाशयों में पानी की उपलब्धता कम होने से कई राज्यों में पेयजल और सिंचाई की चुनौतियां भी बढ़ सकती हैं। हालांकि सरकार का दावा है कि सिंचाई ढांचे, जल भंडारण क्षमता और अग्रिम तैयारी के कारण इस बार हालात पहले की तुलना में बेहतर तरीके से संभाले जा सकेंगे।

अल नीनो का खतरा फिलहाल आशंका के स्तर पर है, लेकिन सरकार ने इसे हल्के में लेने के बजाय पहले से तैयारी शुरू कर दी है। 197 संवेदनशील जिलों की पहचान और राज्यवार कंटिजेंसी प्लान इस बात का संकेत है कि प्रशासन किसी भी चुनौती से निपटने के लिए सतर्क है। अब सबकी नजर मानसून की रफ्तार और आने वाले हफ्तों के मौसम पर टिकी है, क्योंकि यही तय करेगा कि इस साल बारिश राहत लेकर आएगी या फिर अल नीनो की आफत किसानों की मुश्किलें बढ़ाएगी।