दुनिया के कई देश अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत रखने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार यानी फॉरेक्स रिजर्व बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं।

भारत, चीन और जापान जैसे देश लगातार डॉलर और दूसरी विदेशी मुद्राएं जमा कर रहे हैं ताकि आर्थिक संकट के समय हालात संभाले जा सकें।

लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका इस सूची में ऊपर नजर नहीं आता।

इसकी वजह अमेरिकी डॉलर की वैश्विक ताकत और अमेरिका की अलग आर्थिक स्थिति मानी जाती है।

इसी बीच भारत में विदेशी मुद्रा भंडार को लेकर चर्चा तेज हो गई है और विशेषज्ञ इसे तेजी से बढ़ाने की जरूरत बता रहे हैं।

विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक ताकत का अहम हिस्सा माना जाता है। इसमें डॉलर, यूरो, पाउंड और सोने जैसी विदेशी संपत्तियां शामिल होती हैं। यह भंडार किसी भी देश के लिए आर्थिक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। अगर किसी देश की मुद्रा कमजोर हो जाए, विदेशी कर्ज चुकाने की जरूरत पड़े या आयात महंगा हो जाए, तो यही रिजर्व संकट के समय काम आता है।

दुनिया के ज्यादातर देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं। आमतौर पर देशों के कुल फॉरेक्स रिजर्व का 60 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा अमेरिकी डॉलर में रखा जाता है। इसकी वजह यह है कि डॉलर को दुनिया की सबसे भरोसेमंद और सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली मुद्रा माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल खरीद-बिक्री और बड़े वित्तीय लेनदेन ज्यादातर डॉलर में ही होते हैं।

भारत जब विदेशों से सामान खरीदता है तो उसका भुगतान डॉलर में करता है। वहीं जब भारत दूसरे देशों को सामान बेचता है तो बदले में डॉलर ही मिलता है। इसका मतलब यह है कि अगर कोई देश ज्यादा निर्यात करता है, तो उसके पास ज्यादा डॉलर आते हैं और विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होता है। लेकिन अगर कोई देश ज्यादा आयात करता है, तो उसे ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे फॉरेक्स रिजर्व पर दबाव बढ़ता है।

भारत की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का व्यापार घाटा 333.2 अरब डॉलर का रहा। इसका मतलब है कि भारत ने निर्यात की तुलना में ज्यादा आयात किया। भारत अपनी जरूरत का करीब 90 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है और इसी पर सबसे ज्यादा डॉलर खर्च होते हैं।

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक जनवरी महीने में निर्यात और आयात के बीच का अंतर बढ़कर 34.68 अरब डॉलर पहुंच गया था, जबकि एक महीने पहले यह 25.05 अरब डॉलर था। जनवरी में भारत का आयात सालाना आधार पर 19.2 प्रतिशत बढ़कर 71.24 अरब डॉलर हो गया, जबकि निर्यात केवल 0.6 प्रतिशत बढ़कर 36.56 अरब डॉलर तक पहुंच सका।

विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ता व्यापार घाटा विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ाता है। जब आयात ज्यादा होता है तो डॉलर की मांग बढ़ती है और इससे रुपया कमजोर होने लगता है। यही कारण है कि हाल के दिनों में रुपया डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर हुआ और एक डॉलर की कीमत 95 रुपए से ऊपर पहुंच गई।

ऐसी स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) बाजार में हस्तक्षेप करता है। आरबीआई डॉलर बेचकर रुपये को संभालने की कोशिश करता है ताकि भारतीय मुद्रा में ज्यादा गिरावट न आए। लेकिन इसके लिए मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार होना बेहद जरूरी होता है।

फिलहाल भारत के पास करीब 690 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है। हालांकि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व डिप्टी गवर्नर माइकल देबब्रत पात्रा का मानना है कि भारत को आर्थिक रूप से ज्यादा सुरक्षित बनने के लिए कम से कम एक ट्रिलियन डॉलर का फॉरेक्स रिजर्व चाहिए।

उन्होंने कहा था कि यह लक्ष्य दो बड़े सुरक्षा कारणों पर आधारित है। पहला, करीब 350 अरब डॉलर ऐसे होने चाहिए जो एक साल के भीतर चुकाए जाने वाले विदेशी कर्ज को कवर कर सकें। दूसरा, लगभग 650 अरब डॉलर इसलिए जरूरी हैं ताकि विदेशी निवेशकों द्वारा अचानक बड़े पैमाने पर पैसा निकालने की स्थिति में भी भारतीय अर्थव्यवस्था सुरक्षित रह सके।

पात्रा ने यह भी कहा था कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की निकासी कई सालों तक जारी रहने वाली प्रक्रिया हो सकती है। भारत 2022-23 के बाद ऐसी स्थिति का सामना कर चुका है, जब विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से बड़ी मात्रा में पैसा निकाला था। इससे शेयर बाजार और रुपये दोनों पर दबाव बढ़ गया था।

हाल के हफ्तों में ईरान युद्ध और वैश्विक तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली है। चूंकि भारत तेल आयात पर काफी निर्भर है, इसलिए इसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और रुपये पर पड़ता है। तेल महंगा होने से ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ जाता है।

हालांकि अमेरिका की स्थिति बाकी देशों से अलग है। अमेरिका खुद डॉलर छापता है और डॉलर दुनिया की प्रमुख मुद्रा है। इसलिए अमेरिका को अपने आयात का भुगतान करने या अपनी मुद्रा को संभालने के लिए बड़े विदेशी मुद्रा भंडार की जरूरत नहीं पड़ती।

आर्थिक जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में वैश्विक संकट, युद्ध और बाजार में अस्थिरता जैसी चुनौतियां बढ़ सकती हैं। ऐसे में मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार भारत जैसे देशों के लिए केवल आर्थिक ताकत नहीं बल्कि भविष्य की सुरक्षा का बड़ा आधार बन चुका है।