
उमर खालिद की जमानत याचिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों ने देश की न्याय व्यवस्था और गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून जैसे सख्त कानूनों पर नई बहस छेड़ दी है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि बेल नियम है और जेल अपवाद, और यह सिद्धांत केवल सामान्य मामलों तक सीमित नहीं बल्कि गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून जैसे कठोर कानूनों में भी समान रूप से लागू होता है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी इसलिए बेहद अहम मानी जा रही है क्योंकि अदालत ने अप्रत्यक्ष रूप से अपने ही एक पुराने फैसले की कानूनी व्याख्या पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह मामला उस समय चर्चा में आया जब जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच जम्मू-कश्मीर के रहने वाले सैयद इफ्तिखार अंद्राबी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। अंद्राबी पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने नशे के कारोबार और आतंकी फंडिंग से जुड़े आरोप लगाए थे और वह लगभग छह साल से जेल में बंद था। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि किसी आरोपी को अनिश्चित समय तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि अगर मुकदमा लंबे समय तक पूरा होने की संभावना नहीं है, तो आरोपी को केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर जेल में नहीं रखा जा सकता।
इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में आए उस फैसले का जिक्र किया जिसमें उमर खालिद और शरजील इमाम को दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश मामले में जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। उस समय सुप्रीम कोर्ट की दो-जजों की बेंच ने कहा था कि दोनों के खिलाफ प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री मौजूद है और गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून की धारा 43डी(5) के तहत जमानत नहीं दी जा सकती। हालांकि उसी मामले में पांच अन्य आरोपियों को राहत मिल गई थी। अदालत ने तब यह भी कहा था कि उमर खालिद और शरजील इमाम भविष्य में फिर से जमानत याचिका दाखिल कर सकते हैं।
अब नई बेंच ने उसी फैसले पर गंभीर आपत्ति जताई है। जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा कि बड़ी बेंच के फैसले देश का कानून होते हैं और छोटी बेंच उन्हें कमजोर या नजरअंदाज नहीं कर सकती। अदालत ने 2021 के चर्चित यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के ए नजीब फैसले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट की तीन-जजों की बेंच ने कहा था कि अगर मुकदमे में अत्यधिक देरी हो रही हो और आरोपी लंबे समय से जेल में बंद हो, तो संवैधानिक अदालतें गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून जैसे मामलों में भी जमानत दे सकती हैं। कोर्ट ने कहा कि बड़ी बेंच का यह सिद्धांत बाध्यकारी है और छोटी बेंच उससे अलग नहीं जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को कानूनी विशेषज्ञ सुप्रीम कोर्ट बनाम सुप्रीम कोर्ट जैसी स्थिति बता रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि एक बेंच ने अप्रत्यक्ष रूप से दूसरी बेंच की कानूनी व्याख्या को गलत ठहराया है। अदालत ने यह भी कहा कि गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून की कठोर धाराओं का अर्थ यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के वर्षों तक जेल में रखा जाए। कोर्ट के अनुसार, न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य सजा देना नहीं बल्कि निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करना है।
उमर खालिद, जो कभी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र नेता रहे हैं, सितंबर 2020 से जेल में बंद हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने 2020 के दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश में भूमिका निभाई थी। पुलिस और जांच एजेंसियों का दावा है कि विरोध प्रदर्शनों की आड़ में हिंसा की योजना बनाई गई थी, जबकि उमर खालिद लगातार इन आरोपों से इनकार करते रहे हैं। उन्होंने अदालत में कहा था कि उनके खिलाफ पेश किए गए भाषण और बयान संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों ने केवल उमर खालिद के मामले को ही नहीं बल्कि पूरे गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून ढांचे को लेकर बहस तेज कर दी है। लंबे समय से मानवाधिकार कार्यकर्ता और कानूनी विशेषज्ञ यह सवाल उठाते रहे हैं कि अगर किसी मामले में मुकदमा वर्षों तक पूरा नहीं होता, तो क्या आरोपी को लगातार जेल में रखना न्यायसंगत है। अदालत की टिप्पणी को भविष्य में गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून मामलों में जमानत के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ माना जा रहा है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक बड़ा संकेत है।
