मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और चीन के बीच बयानबाज़ी तेज हो गई है। ईरान को लेकर उठे सैन्य सहयोग के आरोपों ने वैश्विक राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। एक तरफ वॉशिंगटन सख्त रुख अपनाए हुए है, तो दूसरी ओर बीजिंग इन आरोपों को पूरी तरह नकार रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने चीन पर आरोप लगाते हुए चेतावनी दी कि यदि China, Iran को हथियारों की आपूर्ति करता पाया गया, तो उसे भारी आर्थिक परिणाम भुगतने होंगे। ट्रंप ने कहा कि ऐसे किसी भी कदम पर 50 प्रतिशत तक का भारी शुल्क लगाया जा सकता है, जो तुरंत प्रभाव से लागू होगा।

चीन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। चीनी विदेश मंत्रालय और वॉशिंगटन स्थित दूतावास के प्रवक्ताओं ने कहा कि ईरान को सैन्य सहायता देने की खबरें “पूरी तरह मनगढ़ंत” हैं। साथ ही चीन ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका इन आधारहीन आरोपों के आधार पर कोई आर्थिक कदम उठाता है, तो वह भी जवाबी कार्रवाई करेगा।


मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव

इसी बीच, अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हुई बातचीत बेनतीजा रही, जिससे क्षेत्र में संघर्ष की आशंका और बढ़ गई है। अमेरिकी नौसेना द्वारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य की नाकेबंदी ने हालात को और गंभीर बना दिया है, जिससे ईरानी जहाजों की आवाजाही लगभग रुक गई है।

चीन ने इस स्थिति को “अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़” बताते हुए सभी पक्षों से तुरंत सैन्य कार्रवाई रोकने की अपील की है। बीजिंग का कहना है कि वह मध्य पूर्व में शांति और स्थिरता बहाल करने के लिए सक्रिय और रचनात्मक भूमिका निभाता रहेगा।


तेल, व्यापार और रणनीतिक टकराव

अमेरिकी अधिकारियों ने चीन पर तेल भंडारण करने और कुछ निर्यात सीमित करने के आरोप लगाए हैं, जिससे वैश्विक बाजार प्रभावित हुआ है। इसके जवाब में चीन ने कहा कि ईंधन संकट की असली वजह मध्य पूर्व में बढ़ता सैन्य तनाव है, न कि उसकी नीतियां।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह विवाद केवल सैन्य या राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक हितों से भी जुड़ा हुआ है। आने वाले समय में Xi Jinping और ट्रंप के बीच संभावित मुलाकात इस पूरे मुद्दे को नई दिशा दे सकती है!


आगे की राह

दुनिया की दो बड़ी ताकतों के बीच बढ़ता यह टकराव वैश्विक संतुलन को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कूटनीतिक प्रयास इस तनाव को कम कर पाएंगे या मध्य पूर्व किसी बड़े संघर्ष की ओर बढ़ रहा है।