भारत के पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में इस बार मतदाताओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में रिकॉर्ड वोटिंग ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। सवाल ये है कि इतनी ज्यादा भागीदारी क्या बदलाव का संकेत है या जनता का मौजूदा सरकारों पर भरोसा? विशेषज्ञों का कहना है कि मतदान प्रतिशत बढ़ने या घटने से चुनावी नतीजे तय नहीं होते, बल्कि इससे मतदाता जागरूकता और राजनीतिक सक्रियता का पता चलता है।


23 अप्रैल को दोनों बड़े राज्यों में भारी मतदान हुआ। पश्चिम बंगाल में पहले चरण की 152 सीटों पर 92.56% वोटिंग हुई, जो राज्य के इतिहास का सबसे ऊंचा स्तर है। तमिलनाडु में सभी 234 सीटों पर 85.13% मतदान दर्ज किया गया, जिसने 2011 के रिकॉर्ड (78.29%) को पीछे छोड़ दिया। इससे पहले असम (85.91%), पुडुचेरी (90%) और केरल (78.27%) में भी अभूतपूर्व मतदान हुआ था। इन पाँचों राज्यों के चुनाव नतीजे 4 मई को आएंगे।


अक्सर माना जाता है कि ज्यादा मतदान का मतलब सत्ता परिवर्तन होता है, लेकिन 70 वर्षों के आंकड़े इस धारणा को सही साबित नहीं करते। आँकड़ों के अनुसार—जब मतदान बढ़ा, तब 52% मौकों पर सरकार वापस लौटी; जब मतदान घटा, तब 44% बार सरकार फिर भी बनी रही। उदाहरण के तौर पर 2011 में बंगाल में थोड़ा ज्यादा मतदान हुआ और वाम मोर्चा सत्ता से बाहर हो गया, जबकि 2021 में मतदान घटने के बावजूद तृणमूल कांग्रेस पहले से अधिक मजबूत होकर लौटी। तमिलनाडु में तो मतदान प्रतिशत और नतीजों का संबंध कभी साफ नहीं रहा है। यह दिखाता है कि सिर्फ वोटिंग प्रतिशत के आधार पर चुनावी नतीजों का अनुमान लगाना गलत है।


तो फिर इतनी भारी मतदान का मतलब क्या है? चुनाव विशेषज्ञों के अनुसार इसके तीन बड़े संकेत हैं। पहला मजबूत राजनीतिक जुटाव। बंगाल और केरल जैसे राज्यों में पार्टियों के ज़मीनी नेटवर्क बहुत मजबूत हैं, जो बूथ लेवल पर वोटरों को लाने में भूमिका निभाते हैं। दूसरा नए और महिला मतदाताओं की बड़ी भागीदारी। तमिलनाडु में इस बार 14.5 लाख से ज्यादा नए मतदाता थे और महिला मतदाता पुरुषों से 10 लाख ज्यादा थीं, जिसने कुल प्रतिशत बढ़ाया। तीसरा—मतदाता सूची में बड़े बदलाव। चुनाव आयोग ने तमिलनाडु में 95 लाख फर्जी, डुप्लीकेट और मृत वोटर हटाए, जिससे सूची छोटी हुई और प्रतिशत अपने-आप बढ़ा हुआ दिखा।


इस बार नतीजों का अनुमान लगाना इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि ज्यादा मतदान का मतलब जरूरी नहीं कि बदलाव हो। चुनाव विश्लेषक अमिताभ तिवारी का कहना है हाई टर्नआउट बदलाव का पैमाना नहीं, सिर्फ भागीदारी का संकेत है।” भारत के 332 विधानसभा चुनावों के डेटा के अनुसार 188 बार मतदान बढ़ा, लेकिन सिर्फ 89 बार सरकार बदली; जबकि 144 बार मतदान घटा, लेकिन 56 बार सरकार फिर भी वापस आई। यानी मतदान प्रतिशत और चुनावी नतीजों का संबंध बहुत कमजोर है।


पश्चिम बंगाल की बात करें तो राजनीतिक विश्लेषक राशिद किदवई मानते हैं कि 92% मतदान बीजेपी के लिए चुनौती हो सकता है। जिन सीटों पर इस चरण में वोट पड़े, वे बीजेपी के मजबूत क्षेत्र माने जाते हैं, लेकिन अल्पसंख्यक और महिला मतदाताओं की बड़ी भागीदारी तृणमूल कांग्रेस के लिए सकारात्मक संकेत हो सकती है। वहीं तमिलनाडु में मतदाता सूची सुधार (SIR अभियान) और कुछ नई परियोजनाओं का असर बीजेपी को भी कुछ लाभ दिला सकता है।


अंत में रिकॉर्ड मतदान ने चुनाव की दिलचस्पी जरूर बढ़ा दी है, लेकिन इससे यह तय नहीं होता कि सत्ता बदलेगी या नहीं। असली तस्वीर 4 मई को सामने आएगी, जब ईवीएम खुलेंगी और यह साफ होगा कि यह भारी मतदान ‘परिवर्तन’ का संकेत था या ‘निरंतरता’ का।