मआज़ ख़ान
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हाल ही में एक कार्यक्रम में टोपी पहनने से इनकार कर दिया। कुछ लोगों ने इसे “अपमान” करार दिया, लेकिन सच यह है कि सम्राट चौधरी ने टोपी न पहनकर टोपी का अपमान नहीं, बल्कि सम्मान किया है। क्योंकि जो प्रतीक जिस धर्म का है, उसे वही धारण करे तो उसकी मर्यादा और गरिमा दोनों बनी रहती हैं।
सच तो यह है कि जो लोग राजनीतिक मंच पर जबरन टोपी पहनाने का प्रयास करते हैं, वे खुद ही उस प्रतीक की गंभीरता को कम कर रहे होते हैं। टोपी पहनाने का उद्देश्य क्या था यह तो वही बेहतर बता सकते हैं जिन्होंने पहनाने की कोशिश की।
समाज में अक्सर दो तरह की सोच दिखती है:
"पहनकर सम्मान" वाली सोच न पहनकर सम्मान" वाली सोच मान्यता किसी धर्मस्थल/कार्यक्रम में उस धर्म का प्रतीक धारण करना अपनापन दिखाता है। मान्यता: किसी धर्म का प्रतीक उसी धर्म के अनुयायी के लिए पवित्र है। दूसरा पहने तो वो “कॉस्ट्यूम” बन सकता है।
मंदिर में टीका लगाना, गुरुद्वारे में सिर ढकना, इफ्तार में टोपी पहनना। जनेऊ गैर-ब्राह्मण का न पहनना, सिख की पगड़ी गैर-सिख का न पहनना, तिलक गैर-हिंदू का न लगाना।
भाव: हम आपके जैसे हैं भाव: हम आपकी अलग पहचान का आदर करते हैं
दोनों का मकसद एक ही है – सम्मान देना। तरीका अलग है, नीयत नहीं।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने क्या किया?
दिखावे से इनकार, दिल से इकरार: उन्होंने मंच साझा किया, बात सुनी, मुस्कुराए। सिर्फ टोपी नहीं पहनी। यानी व्यक्ति का सम्मान पूरा, प्रतीक का इस्तेमाल नहीं।
हर प्रतीक की गरिमा बचाई: टोपी इस्लाम में इबादत और अदब का प्रतीक है। उसे राजनीतिक मंच पर “फोटो ऑप” की तरह इस्तेमाल करने से उसकी गंभीरता घटती है। न पहनना भी एक तरह से उसकी पवित्रता को मान देना है।
बाबासाहेब का सिद्धांत: डॉ. अंबेडकर ने कहा था – “मैं हर धर्म का आदर करता हूँ, पर अपना धर्म नहीं बदलूँगा।” पहचान का आदर तभी है जब हम उसे नकल नहीं, समझ दें।
इतिहास क्या सिखाता है?
डॉ. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति रहते ईद मिलन में जाते थे, टोपी नहीं पहनते थे, पर गले मिलते थे। किसी को बुरा नहीं लगा।
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम मंदिर, चर्च, गुरुद्वारा सब गए। माथा टेका, मोमबत्ती जलाई, पर पूजा-पद्धति नहीं अपनाई। देश ने उन्हें “जनता का राष्ट्रपति” कहा।
गुरु नानक देव ने कहा: “ना को बैरी, ना बेगाना” – पर उन्होंने जनेऊ और तिलक धारण नहीं किए। सम्मान पूरा, पहचान अपनी।
तो सही रास्ता क्या है?
"आदर दो, अधिकार मत लो" – यही सद्भावना का सूत्र है।
सम्राट चौधरी या किसी भी नेता को टोपी या किसी तरह की कोई धार्मिक प्रतीक देने से पहले उनसे पूछना चाहिए।
नकल नहीं, नजदीक: धर्मों के बीच दूरी मिटानी है, पहचान मिटानी नहीं। एक-दूसरे के त्योहार में शामिल हों, खाना खाएं, गले मिलें। प्रतीक उधार लेने से मोहब्बत नहीं बढ़ती, मोहब्बत बढ़ती है नीयत से।
बच्चों को ये सिखाएँ: स्कूल में ईद, दिवाली, क्रिसमस सब मनाओ। टोपी, दीया, क्रिसमस ट्री सब सजाओ। पर ये भी बताओ कि टोपी इबादत की है, दीया आस्था का है – खिलौना नहीं।
धर्म टोपी से बड़े होते हैं:
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने टोपी न पहनकर इस्लाम को नीचा नहीं दिखाया, और न ही उनके टोपी न पहनने से इस्लाम छोटा हो गया। धर्म इतने कमजोर नहीं होते कि एक टोपी न पहनने के इंकार से उनका अपमान हो जाए।
अगर सम्राट चौधरी का मकसद इस्लाम का अपमान होता, तो उनके हाव-भाव से झलक जाता। धर्म का अपमान तब होता है जब हम एक-दूसरे की बात काटें, एक-दूसरे के त्योहारों पर पत्थर फेंकें, खाने और पहनावे पर रोक-टोक करें। असली सम्मान तब है जब हम कहेंआपकी टोपी आपके सिर पर खूब जंचती है, और आपका दिल हमारे दिल के पास है।”
इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि टोपी का रंग अलग हो सकता है, पर आँसू का रंग तो एक है। सिर ढकने का तरीका अलग हो सकता है, पर सिर झुकाने की तहज़ीब एक है। इसी एकता में भारत की खूबसूरती है।
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Adnan Alam
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