ere | Source: rerनई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने हत्या जैसे जघन्य अपराधों में किशोर आरोपियों से जुड़े मामलों पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत निर्धारित कानूनी शर्तें पूरी होती हैं, तो 16 वर्ष या उससे अधिक आयु के आरोपी किशोर पर भी वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है। न्यायालय ने कहा कि हत्या का अपराध अधिनियम के अनुसार "जघन्य अपराध" की श्रेणी में आता है और ऐसे मामलों में विधि के अनुसार वयस्क की तरह सुनवाई का रास्ता खुला रहता है।

बिहार के हत्या मामले पर आया अहम फैसला

यह फैसला बिहार के एक चर्चित हत्या मामले में दायर अपील पर सुनाया गया। मामला मई 2022 का है, जिसमें अभियोजन पक्ष के अनुसार 16 वर्ष 4 माह आयु के एक किशोर पर दूसरे नाबालिग की चाकू से गला रेतकर हत्या करने का आरोप है। इसी मामले में आरोपी किशोर ने पटना हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने अपील खारिज करते हुए पटना हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया और कहा कि मामले में वयस्क की तरह मुकदमा चलाने का निर्णय कानून के अनुरूप है।

किशोर न्याय अधिनियम की व्याख्या भी की स्पष्ट

अपने विस्तृत निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने किशोर न्याय अधिनियम के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए कहा कि हत्या जैसे अपराध को "जघन्य अपराध" माना जाएगा। न्यायालय ने कहा कि इस फैसले का उद्देश्य नाबालिगों पर वयस्कों की तरह मुकदमा चलाने से जुड़े कानूनी ढांचे को स्पष्ट करना भी है, ताकि भविष्य में ऐसे मामलों में कानून की एक समान व्याख्या हो सके।

पटना हाई कोर्ट ने पहले क्या कहा था?

पटना हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि आरोपी किशोर के मामले की सुनवाई वयस्क आरोपी की तरह होनी चाहिए। इसके लिए किशोर न्याय बोर्ड को निर्देश दिया गया था कि वह मामले को नियमित अदालत में स्थानांतरित करे।

इस मामले में कानूनी विवाद मुख्य रूप से "जघन्य अपराध" की परिभाषा को लेकर था। किशोर न्याय अधिनियम के अनुसार ऐसे अपराध, जिनमें कम से कम सात वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है, उन्हें जघन्य अपराध माना जाता है।

बचाव पक्ष ने दी थी यह दलील

आरोपी किशोर की ओर से अदालत में दलील दी गई कि भारतीय दंड संहिता (पूर्ववर्ती आईपीसी) की धारा 302 में "मृत्युदंड या आजीवन कारावास" का प्रावधान है, लेकिन उसमें "कम से कम" शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है। इसलिए हत्या के अपराध को जघन्य अपराध नहीं बल्कि गंभीर अपराध माना जाना चाहिए और आरोपी पर वयस्क की तरह मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज की दलील

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला ने पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए कहा कि धारा 302 के तहत दोषसिद्ध होने पर अदालत आजीवन कारावास से कम सजा नहीं दे सकती। इसलिए हत्या के अपराध में आजीवन कारावास ही न्यूनतम सजा मानी जाएगी।

अदालत ने स्पष्ट कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या के अपराध में मृत्युदंड या आजीवन कारावास का प्रावधान है और इसमें न्यूनतम दंड आजीवन कारावास ही है। इसी आधार पर इसे किशोर न्याय अधिनियम के तहत "जघन्य अपराध" की श्रेणी में रखा जाएगा।

किशोर न्याय बोर्ड से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

मामले की शुरुआत में किशोर न्याय बोर्ड ने निर्णय लिया था कि आरोपी का मुकदमा बोर्ड के समक्ष ही चलेगा। बाद में अपीलीय सत्र न्यायालय ने इस आदेश को पलटते हुए वयस्क की तरह मुकदमा चलाने का निर्देश दिया। इसके बाद पटना हाई कोर्ट ने भी उसी निर्णय को बरकरार रखा।

हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ आरोपी किशोर ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने भी हाई कोर्ट के फैसले को सही मानते हुए अपील खारिज कर दी।

फैसले का कानूनी महत्व

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय किशोर न्याय अधिनियम की व्याख्या के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि यदि कोई किशोर 16 वर्ष या उससे अधिक आयु का है और उस पर हत्या जैसे जघन्य अपराध का आरोप है, तो अधिनियम में निर्धारित प्रक्रिया और शर्तों के अनुरूप उसके खिलाफ वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है।