erere | Source: ererनई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर साफ दिखाई देने लगा है। ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष के बीच पहले होर्मुज स्ट्रेट में उत्पन्न बाधाओं ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित किया था। अब बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर भी संकट गहराने से भारत सहित कई देशों की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है, तो भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति, परिवहन लागत और आयात व्यवस्था पर दबाव का सामना करना पड़ सकता है।

बाब अल-मंदेब क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य लाल सागर को हिंद महासागर से जोड़ने वाला दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। इसी रास्ते से पश्चिम एशिया से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और अन्य आवश्यक वस्तुएं विभिन्न देशों तक पहुंचती हैं। इस मार्ग में किसी भी प्रकार की बाधा का असर वैश्विक समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है।

सऊदी अरब के तीन तेल टैंकरों ने बदला रास्ता

संकट के बीच सऊदी अरब से भारत और चीन के लिए कच्चा तेल लेकर रवाना हुए तीन तेल टैंकरों—'शिन लॉन्ग यांग', 'रोडोस' और 'अमेजन'—को लाल सागर में यू-टर्न लेना पड़ा। यह घटनाक्रम उस समय सामने आया जब हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी की घोषणा की।

इस घटनाक्रम ने पश्चिम एशिया में जारी तनाव को नया आयाम दे दिया है और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है।

भारत के लिए आ रहे थे दो टैंकर

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 'रोडोस' और 'अमेजन' नामक दो तेल टैंकर भारत के लिए कच्चा तेल लेकर आ रहे थे। हालांकि, बाब अल-मंदेब मार्ग से आने वाले गैर-सऊदी तेल टैंकरों के संचालन में फिलहाल किसी बड़े व्यवधान की सूचना नहीं है।

सूत्रों के अनुसार, भारत संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के फुजैराह टर्मिनल सहित अन्य वैकल्पिक स्रोतों से भी कच्चे तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करने में सफल रहा है।

लंबे समय तक संकट रहा तो बढ़ सकती हैं मुश्किलें

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज स्ट्रेट और बाब अल-मंदेब दोनों समुद्री मार्गों पर लंबे समय तक बाधाएं बनी रहती हैं, तो भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इससे आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होने, परिवहन समय बढ़ने और ऊर्जा बाजार में अस्थिरता आने की आशंका बनी रहेगी।

हूती विद्रोहियों की चेतावनी से बढ़ी चिंता

रिपोर्ट के अनुसार, हूती विद्रोहियों ने शिपिंग कंपनियों को भेजे गए एक ईमेल में चेतावनी दी है कि वे सऊदी अरब के बंदरगाहों पर न तो सामान लोड करें और न ही उतारें। चेतावनी में कहा गया कि निर्देशों की अनदेखी करने वाले जहाजों को किसी भी स्थान पर निशाना बनाया जा सकता है।

हूतियों का नियंत्रण उत्तरी यमन के बड़े हिस्से पर है, जिसमें लाल सागर के प्रवेश द्वार पर स्थित बाब अल-मंदेब का तटीय क्षेत्र भी शामिल है।

होर्मुज के बाद यानबू बंदरगाह बना था विकल्प

होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ती रुकावटों के बाद सऊदी अरब का लाल सागर स्थित यानबू बंदरगाह पश्चिम एशियाई तेल निर्यात का प्रमुख वैकल्पिक केंद्र बनकर उभरा था। इसी मार्ग के जरिए प्रतिदिन लाखों बैरल कच्चे तेल का निर्यात संभव हो रहा था।

हालांकि, बाब अल-मंदेब क्षेत्र में उत्पन्न नई स्थिति ने इस वैकल्पिक मार्ग पर भी दबाव बढ़ा दिया है।

समुद्री सुरक्षा को लेकर नई चुनौती

रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि होर्मुज स्ट्रेट के कुछ हिस्सों में बारूदी सुरंगें (माइंस) बिछाए जाने की खबरों ने वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही को और अधिक जटिल बना दिया है। इससे अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियां अतिरिक्त सतर्कता बरत रही हैं और कई जहाज वैकल्पिक मार्गों पर विचार कर रहे हैं।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह स्थिति?

भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में पश्चिम एशिया के प्रमुख समुद्री मार्गों पर किसी भी प्रकार का व्यवधान देश की ऊर्जा आपूर्ति, आयात व्यवस्था और समुद्री व्यापार पर असर डाल सकता है। हालांकि, फिलहाल भारत वैकल्पिक स्रोतों और मार्गों के माध्यम से आपूर्ति बनाए रखने का प्रयास कर रहा है।