erer | Source: errereरांची। देशभर में आज 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जा रहा है। यह दिन भारत के दूसरे राष्ट्रपति और महान शिक्षाविद डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के अवसर पर शिक्षकों के योगदान को सम्मान देने के लिए समर्पित है। शिक्षक दिवस के इस खास मौके पर झारखंड के चतरा जिले से एक ऐसे शिक्षक की कहानी सामने आती है, जिसने सीमित संसाधनों और बेहद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद सरकारी स्कूल की तस्वीर बदलने में अहम भूमिका निभाई। यह कहानी है शिक्षक बिनेश्वर कुमार की, जिन्हें गांव के लोग प्यार से ‘छोटे सर’ कहने लगे।

जब स्कूल पहुंचने पर मिला सन्नाटा

सितंबर 2001 में बिनेश्वर कुमार की पोस्टिंग चतरा जिले के टंडवा प्रखंड के सुदूरवर्ती हेसातु गांव के प्राथमिक विद्यालय में हुई थी। उस समय उनकी उम्र करीब 22-23 साल थी। बच्चों को पढ़ाने का उत्साह लेकर जब वह स्कूल पहुंचे तो वहां का नजारा देखकर हैरान रह गए। स्कूल में पढ़ने के लिए एक भी बच्चा नहीं था।

जानकारी मिली कि विद्यालय पिछले छह महीने से बंद पड़ा था। दो कमरों का स्कूल भवन भी जर्जर हालत में था। खिड़कियां टूटी थीं और बच्चों के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव था। इसके अलावा उस दौर में इलाके में नक्सली गतिविधियों का प्रभाव था। ऐसे माहौल में करीब 16 किलोमीटर का दुर्गम रास्ता तय करके स्कूल पहुंचना अपने आप में बड़ी चुनौती थी।

बच्चे स्कूल नहीं आए तो शिक्षक खुद पहुंच गए घर

बिनेश्वर कुमार ने परिस्थितियों के सामने हार मानने के बजाय एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने इंतजार नहीं किया कि बच्चे खुद स्कूल पहुंचेंगे। वह रोज सुबह गांव के घरों में जाने लगे और अभिभावकों से बच्चों को स्कूल भेजने की अपील करने लगे।

धीरे-धीरे उनकी मेहनत का असर दिखाई देने लगा। बच्चों को स्कूल से जोड़ने के लिए उन्होंने पढ़ाई के साथ खेल और मनोरंजन का सहारा लिया। फुटबॉल, रस्सी और चॉकलेट जैसी छोटी-छोटी चीजों के जरिए उन्होंने बच्चों में स्कूल आने को लेकर रुचि पैदा की। जिन बच्चों के लिए स्कूल की राह लगभग बंद हो चुकी थी, उनमें पढ़ाई के प्रति आकर्षण पैदा होने लगा।

इसी मेहनत ने दिलाया ‘छोटे सर’ का नाम

बिनेश्वर कुमार को लगातार बच्चों के बीच मेहनत करते देखकर गांववालों का भरोसा भी बढ़ने लगा। उन्होंने केवल स्कूल में पढ़ाई कराने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि गांव के सामाजिक मुद्दों पर भी लोगों को जागरूक किया।

ग्रामीणों को अंधविश्वास, बाल विवाह और नशाखोरी जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ जागरूक किया गया। इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी लोगों में समझ विकसित करने का प्रयास किया गया। शिक्षक की लगातार सक्रियता और बच्चों के भविष्य के प्रति समर्पण ने उन्हें गांव में अलग पहचान दिलाई। इसके बाद ग्रामीण उन्हें प्यार से ‘छोटे सर’ कहने लगे।

गांववालों ने भी स्कूल को बदलने में दिया साथ

बिनेश्वर कुमार की पहल के साथ धीरे-धीरे ग्रामीणों का सहयोग भी मिलने लगा। गांववालों की मदद से पहाड़ी रास्ते का निर्माण कराया गया, जिससे स्कूल तक पहुंचना आसान हो सके। स्कूल परिसर में करीब 200 फीट लंबी गार्डवाल बनाकर जमीन का समतलीकरण भी कराया गया।

इन प्रयासों से स्कूल का माहौल धीरे-धीरे बदलता गया। जिस विद्यालय में कभी बच्चों की मौजूदगी नहीं थी, वहां शिक्षा को लेकर गतिविधियां बढ़ने लगीं। शिक्षक, अभिभावक और ग्रामीणों के बीच सहयोग की भावना मजबूत हुई और स्कूल गांव के बच्चों के लिए शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र बनने लगा।

पुरस्कार में मिले एक लाख रुपये भी बच्चों के नाम कर दिए

बिनेश्वर कुमार की मेहनत को राज्य स्तर पर भी पहचान मिली। वर्ष 2022 में उन्हें राज्यस्तरीय उत्कृष्ट शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस पुरस्कार के तहत उन्हें एक लाख रुपये मिले।

आमतौर पर पुरस्कार की राशि व्यक्ति अपने लिए खर्च कर सकता है, लेकिन बिनेश्वर कुमार ने इस रकम को भी स्कूल और बच्चों की सुविधाओं पर खर्च करने का फैसला किया। उन्होंने पुरस्कार में मिली पूरी एक लाख रुपये की राशि स्कूल के खेल मैदान के विकास में लगा दी।

यह फैसला उनके लिए स्कूल और बच्चों को अपनी निजी जरूरतों से ऊपर रखने की सोच को दर्शाता है। उनकी इसी प्रतिबद्धता ने उन्हें एक ऐसे शिक्षक के रूप में पहचान दिलाई, जिनकी कहानी शिक्षक दिवस पर विशेष रूप से प्रेरणा देती है।

आज उसी स्कूल में पढ़ रहे हैं 300 से ज्यादा बच्चे

बिनेश्वर कुमार की कहानी का सबसे बड़ा बदलाव स्कूल में बच्चों की संख्या से दिखाई देता है। जिस प्राथमिक विद्यालय में उनके पहुंचने के समय एक भी बच्चा नहीं आता था और जो छह महीने तक बंद रहा था, उसी हेसातु गांव के प्राथमिक विद्यालय में आज 300 से ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हैं।

यह बदलाव एक दिन में नहीं आया। इसके पीछे वर्षों की मेहनत, बच्चों के घर तक पहुंचने की पहल, ग्रामीणों का विश्वास और स्कूल के विकास के लिए लगातार किए गए प्रयास शामिल हैं। बिनेश्वर कुमार ने बच्चों को स्कूल तक लाने के साथ-साथ गांव के लोगों को भी शिक्षा और सामाजिक जागरूकता से जोड़ने का प्रयास किया।

अब प्रधानाध्यापक की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं बिनेश्वर कुमार

वर्तमान में बिनेश्वर कुमार इसी स्कूल के प्रधानाध्यापक हैं। करीब 2001 में एक ऐसे विद्यालय से उनका सफर शुरू हुआ था, जहां पढ़ने वाला कोई बच्चा नहीं था। आज उसी स्कूल में 300 से ज्यादा बच्चे शिक्षा हासिल कर रहे हैं।

बिनेश्वर कुमार की कहानी यह बताती है कि किसी सरकारी स्कूल की तस्वीर केवल भवन और सुविधाओं से नहीं बदलती, बल्कि शिक्षक की इच्छाशक्ति, बच्चों के प्रति लगाव और समुदाय के सहयोग से भी बड़ा बदलाव संभव है। चतरा के हेसातु गांव में ‘छोटे सर’ के नाम से पहचाने जाने वाले बिनेश्वर कुमार ने अपने काम से शिक्षक की भूमिका को केवल कक्षा तक सीमित नहीं रखा।

शिक्षक दिवस पर इसलिए खास है ‘छोटे सर’ की कहानी

शिक्षक दिवस पर जब देशभर में शिक्षकों के योगदान को याद किया जा रहा है, तब बिनेश्वर कुमार की कहानी शिक्षा के प्रति समर्पण की एक मिसाल के तौर पर सामने आती है। छह महीने से बंद स्कूल से शुरू हुआ सफर आज 300 से अधिक बच्चों तक पहुंच चुका है। एक जर्जर विद्यालय, दुर्गम रास्ता और चुनौतीपूर्ण माहौल भी उनके हौसले को रोक नहीं सका।

बच्चों को घर से स्कूल तक लाने से लेकर स्कूल के विकास के लिए अपने पुरस्कार की राशि खर्च करने तक, बिनेश्वर कुमार की यात्रा बताती है कि एक शिक्षक की कोशिश केवल एक बच्चे की जिंदगी नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की दिशा बदल सकती है।