तलहा रशादी, राष्ट्रीय ओलमा कौंसिल

तलहा रशादी, राष्ट्रीय ओलमा कौंसिल


सहारनपुर। सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित पुरानी मस्जिद को ढहाए जाने के मामले ने राजनीतिक और कानूनी बहस को तेज कर दिया है। राष्ट्रीय ओलमा कौंसिल के राष्ट्रीय महासचिव एवं अधिवक्ता तलहा रशादी ने कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए इसे स्थापित कानूनी प्रक्रिया और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ बताया है।

तलहा रशादी के मुताबिक, कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित यह मस्जिद वर्ष 1911 से पहले की बताई जाती है। उनका आरोप है कि मस्जिद को बिना अपील का पर्याप्त अवसर दिए और पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना अचानक ध्वस्त कर दिया गया। उन्होंने दावा किया कि मस्जिद की जमीन राजस्व अभिलेखों में मुस्लिम पक्ष के नाम दर्ज है और इस मामले में Places of Worship Act, Waqf by User और Limitation Act जैसे कानूनी प्रावधानों की प्रासंगिकता बनती है।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब मस्जिद से जुड़ा मामला अदालत में विचाराधीन था, तो मस्जिद कमेटी को अपना पक्ष रखने और न्यायिक राहत हासिल करने का पूरा अवसर क्यों नहीं दिया गया। रशादी ने कहा कि किसी भी विवादित संपत्ति पर कार्रवाई करते समय कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना जरूरी है और केवल प्रशासनिक या राजनीतिक निर्णय के आधार पर स्थापित प्रक्रिया को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

राष्ट्रीय ओलमा कौंसिल के नेता ने यह भी कहा कि यदि सत्ता में बैठे लोगों की मंशा या राजनीतिक हितों के कारण Rule of Law और स्थापित कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार किया जाने लगे, तो इससे न्याय, लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होंगे। उन्होंने कार्रवाई की वैधानिकता की जांच की मांग की है।

रशादी ने न्यायपालिका से मामले का संज्ञान लेने और ऐसी कार्रवाई पर रोक लगाने की अपील की। साथ ही उन्होंने मांग की कि मस्जिद गिराए जाने की पूरी प्रक्रिया की कानूनी समीक्षा हो तथा यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जाए।

उन्होंने अपने बयान में इस घटना को व्यापक राजनीतिक और संवैधानिक संदर्भ से भी जोड़ते हुए कहा कि देश की आजादी के लिए जिन लोगों ने बलिदान दिया, उनका उद्देश्य ऐसा भारत बनाना था जहां हर नागरिक के अधिकार कानून और संविधान से सुरक्षित हों। उन्होंने चिंता जताई कि यदि धार्मिक स्थलों, मकानों और अन्य संपत्तियों पर कानून की प्रक्रिया से अलग जाकर कार्रवाई होने लगे तो इससे अल्पसंख्यक समुदाय में असुरक्षा की भावना बढ़ सकती है।

तलहा रशादी ने कहा कि सहारनपुर की घटना को केवल एक मस्जिद से जुड़े विवाद के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे कानून के शासन, न्यायिक प्रक्रिया और संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि कार्रवाई में धार्मिक आधार पर भेदभाव की आशंका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

हालांकि, मस्जिद के निर्माण, भूमि के स्वामित्व, न्यायालय में लंबित मामले की स्थिति और प्रशासन द्वारा ध्वस्तीकरण के लिए बताए गए आधिकारिक आधार से जुड़े दावों की स्वतंत्र पुष्टि इस बयान से अलग आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर की जानी बाकी है।