नई दिल्ली। आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में फिर से बढ़ोतरी हो सकती है। इस आशंका ने ऊर्जा बाजार के साथ-साथ आम उपभोक्ताओं की चिंता भी बढ़ा दी है। वैश्विक निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) से कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित रहती है, तो ब्रेंट क्रूड की कीमत बढ़कर 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। यदि ऐसा होता है तो भारत सहित कई देशों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है।
तेल आपूर्ति पर संकट गहराया तो बढ़ सकती हैं कीमतें
गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक ऊर्जा बाजार इस समय कई भू-राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति में रुकावट और रेड सी (लाल सागर) के समुद्री मार्ग पर शिपिंग गतिविधियों में संभावित बाधा के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल का जोखिम बना हुआ है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को लेकर अनिश्चितता लगातार बढ़ रही है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि मौजूदा हालात लंबे समय तक बने रहते हैं, तो ब्रेंट क्रूड की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। ऐसी स्थिति में तेल आयात करने वाले देशों की लागत बढ़ेगी और इसका असर पेट्रोल, डीजल तथा अन्य ईंधनों की खुदरा कीमतों पर भी देखने को मिल सकता है।
तनाव कम होने पर राहत की भी संभावना
हालांकि गोल्डमैन सैक्स ने यह भी अनुमान जताया है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव कम हो जाता है और तेल आपूर्ति सामान्य बनी रहती है, तो वर्ष की चौथी तिमाही में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है। वहीं अगले वर्ष इसके औसतन 75 डॉलर प्रति बैरल तक आने की संभावना भी व्यक्त की गई है।
इसका अर्थ है कि वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियां ही आने वाले समय में कच्चे तेल की दिशा तय करेंगी। यदि हालात सामान्य होते हैं तो ईंधन बाजार को राहत मिल सकती है, लेकिन तनाव बढ़ने पर कीमतों में तेजी की आशंका बनी रहेगी।
अमेरिका-ईरान तनाव से बढ़ी चिंता
रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा यमन में ईरान समर्थित हूथी विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब से होने वाली तेल आपूर्ति को बाधित करने की धमकियों के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमत फिर से 91 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि रेड सी का समुद्री मार्ग पर्शियन गल्फ से निकलने वाले कच्चे तेल को दुनिया के विभिन्न देशों तक पहुंचाने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि इस मार्ग पर किसी प्रकार की बाधा आती है तो वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे कीमतों में तेजी आ सकती है।
युद्धविराम प्रस्ताव से बनी उम्मीद
इस बीच ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया है कि तेहरान को मध्यस्थ देशों की ओर से 10 दिन के युद्धविराम का प्रस्ताव मिला है। इस पहल का उद्देश्य 17 जून को हुए अंतरिम समझौते को बनाए रखना और दोनों पक्षों के बीच स्थायी समाधान का रास्ता तैयार करना है।
यदि यह प्रयास सफल रहता है तो पश्चिम एशिया में तनाव कम हो सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार को भी राहत मिलने की संभावना है।
संघर्ष ने बढ़ाई वैश्विक अनिश्चितता
गौरतलब है कि मौजूदा सैन्य संघर्ष 28 फरवरी को शुरू हुआ था, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमले किए थे। इसके बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की। इस संघर्ष में हजारों लोगों की जान जा चुकी है और इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर लगातार दिखाई दे रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी किसी भी बड़े संघर्ष का सीधा प्रभाव कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ता है, क्योंकि दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देशों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र में स्थित है।
भारत पर क्यों पड़ सकता है बड़ा असर?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। देश अपनी कुल जरूरत का 70 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर भारत की आयात लागत भी बढ़ जाती है।
भारत के कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी सबसे अधिक बनी हुई है। इसके अलावा सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता हैं। पश्चिम अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से आयात बढ़ाकर भारत ने अपने आयात स्रोतों में विविधता भी लाई है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिली है।
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा कच्चे तेल का आयात
जानकारी के अनुसार जून महीने में भारत का कच्चे तेल का आयात बढ़कर 49.3 लाख बैरल प्रतिदिन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास संभावित आपूर्ति बाधा की आशंका को देखते हुए भारतीय कंपनियों ने पहले से अधिक खरीदारी की, जिसके कारण आयात में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।
इसी अवधि में रूस से भारत का कच्चे तेल आयात बढ़कर लगभग 27 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया, जो देश के कुल आयात का आधे से अधिक हिस्सा है। इससे रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चे तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है।
भारत में ईंधन कीमतों पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती है और यह लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती है, तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय तेल विपणन कंपनियों, अंतरराष्ट्रीय कीमतों, विनिमय दर और सरकारी नीतियों पर निर्भर करेगा।
