CJP Protest: यह है अब तक का सबसे आक्रामक आंदोलन, जानिए कितने आंदोलनकारियों की गई थी जान? | Source: Abp News.comकॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के हालिया संसद मार्च ने देश में जन आंदोलनों और उनके इतिहास को लेकर नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्टों के अनुसार, संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हुई, जिसके बाद पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज किया। इस घटनाक्रम के बाद एक बार फिर उन ऐतिहासिक आंदोलनों की चर्चा तेज हो गई है, जो या तो हिंसक रूप ले बैठे थे या फिर जिन्हें सरकार ने सख्ती के साथ नियंत्रित किया था।

CJP Protest: यह है अब तक का सबसे आक्रामक आंदोलन, जानिए कितने आंदोलनकारियों की गई थी जान?Source : Abp News.com

1857 का विद्रोह भारत के इतिहास में ब्रिटिश शासन के खिलाफ पहला व्यापक सशस्त्र जनविद्रोह माना जाता है। इसकी शुरुआत भारतीय सैनिकों के असंतोष से हुई थी, लेकिन देखते ही देखते यह आंदोलन उत्तर और मध्य भारत के कई हिस्सों में फैल गया। इस संघर्ष में सैनिकों के साथ बड़ी संख्या में आम नागरिक, स्थानीय शासक और स्वतंत्रता सेनानी भी शामिल हुए, जिसने इसे आजादी की लड़ाई का एक महत्वपूर्ण अध्याय बना दिया।

विद्रोह के जवाब में ब्रिटिश शासन ने व्यापक सैन्य अभियान चलाया और कई इलाकों में कठोर कार्रवाई की। आंदोलन को दबाने के दौरान बड़ी संख्या में विद्रोहियों और नागरिकों की मौत हुई। हालांकि, इस संघर्ष में मारे गए लोगों की वास्तविक संख्या को लेकर आज भी इतिहासकारों के बीच अलग-अलग मत हैं। इसके बावजूद 1857 का विद्रोह भारतीय औपनिवेशिक इतिहास के सबसे बड़े और सबसे घातक संघर्षों में गिना जाता है, जिसने आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन की नींव को और मजबूत किया।

जलियांवाला बाग हत्याकांड

13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में हुई घटना भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे दर्दनाक अध्यायों में से एक मानी जाती है। उस दिन रॉलेट एक्ट के विरोध में बड़ी संख्या में लोग शांतिपूर्ण सभा के लिए एकत्र हुए थे। इसी दौरान ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर के नेतृत्व में ब्रिटिश सैनिकों ने बिना किसी चेतावनी के निहत्थी भीड़ पर गोलियां चला दीं, जिससे पूरा जलियांवाला बाग खून से लाल हो गया।

ब्रिटिश सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार इस गोलीकांड में 379 लोगों की मौत‌हुई थी, जबकि भारतीय स्रोतों और बाद की कई जांचों में मृतकों की संख्या 1,000 से अधिक बताई गई है। इस नरसंहार ने पूरे देश को झकझोर दिया और ब्रिटिश शासन के प्रति जनता का गुस्सा कई गुना बढ़ गया। इतिहासकारों के अनुसार, जलियांवाला बाग हत्याकांड भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ, जिसने आजादी की लड़ाई को नई दिशा और व्यापक जनसमर्थन प्रदान किया।

भारत छोड़ो आंदोलन

1942 में महात्मा गांधी के "करो या मरो" के आह्वान के साथ शुरू हुआ भारत छोड़ो आंदोलन ब्रिटिश शासन के खिलाफ सबसे व्यापक जन आंदोलनों में से एक माना जाता है। इस आंदोलन के दौरान देशभर में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन, हड़तालें और सविनय अवज्ञा अभियान चलाए गए। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, आंदोलन को दबाने के लिए की गई पुलिस फायरिंग और दमनात्मक कार्रवाई में 1,028 लोगों की मौत हुई थी। इस आंदोलन ने भारत की आजादी की लड़ाई को निर्णायक मोड़ देने में अहम भूमिका निभाई।

तेलंगाना किसान सशस्त्र संघर्ष

1946 से 1951 के बीच तेलंगाना क्षेत्र में सामंती जमींदारों और निजाम शासन के खिलाफ किसानों ने व्यापक सशस्त्र आंदोलन छेड़ा। इस संघर्ष में लंबे समय तक सशस्त्र प्रतिरोध, पुलिस और सैन्य कार्रवाई देखने को मिली। विभिन्न ऐतिहासिक आकलनों के अनुसार, इस आंदोलन में 4,000 से अधिक किसान और कार्यकर्ता मारे गए। स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधारों और किसानों के अधिकारों को लेकर बनी नीतियों पर इस संघर्ष का गहरा प्रभाव माना जाता है।

नक्सलवादी आंदोलन

1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ नक्सलवादी आंदोलन भूमि सुधारों और सामाजिक असमानता के मुद्दे पर किसानों के सशस्त्र विद्रोह के रूप में उभरा। समय के साथ यह आंदोलन कई राज्यों तक फैल गया और देश की सबसे लंबी आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में शामिल हो गया। दशकों से जारी इस संघर्ष में नागरिकों, सुरक्षाबलों और उग्रवादी संगठनों के सदस्यों समेत 10,000 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। इतिहासकार इसे स्वतंत्र भारत के सबसे लंबे और सबसे जटिल आंतरिक संघर्षों में से एक मानते हैं।