ere | Source: errerचेन्नई। तमिलनाडु के मयिलादुथुराई जिले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की हालिया खोज ने चोल साम्राज्य के इतिहास से जुड़ी एक महत्वपूर्ण जानकारी सामने लाई है। थेरालुंधुर स्थित वेदपुरीश्वरर मंदिर में चोल सम्राट राजा राजा चोल प्रथम के शासनकाल का एक नया शिलालेख मिला है। करीब एक हजार वर्ष से अधिक पुराना यह शिलालेख मंदिर के अर्धमंडप के पत्थर के खंभे पर दर्ज है। इसमें मंदिर में पूजा और दैनिक भोग की व्यवस्था के लिए सोने के दान का उल्लेख किया गया है।

यह शिलालेख वर्ष 1003 ईस्वी का है, जिसे राजा राजा चोल प्रथम के शासनकाल का 18वां वर्ष बताया गया है। तमिल भाषा में अंकित इस अभिलेख से उस समय मंदिरों की धार्मिक गतिविधियों के संचालन और दान की व्यवस्था से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आती है। ASI के एपिग्राफी विभाग ने हाल ही में मंदिर में मौजूद चोलकालीन शिलालेखों का दस्तावेजीकरण किया है।

21 कलंजु सोने के दान का उल्लेख

शिलालेख में तिरुवझुंतुर की महासभा द्वारा तिरुकदवुदैया नयनार देवता को भोजन यानी ‘नेय्यामुदु’ चढ़ाने के लिए 21 कलंजु सोना दान किए जाने का उल्लेख है। तिरुवझुंतुर की महासभा उस समय की स्थानीय प्रशासनिक संस्था थी। इसे ‘ब्रह्मदेय’ क्षेत्र के संदर्भ में बताया गया है, यानी ऐसी कर-मुक्त भूमि जो ब्राह्मणों को प्रदान की गई थी।

शिलालेख में दर्ज ‘कलंजु’ प्राचीन समय में सोने को मापने की एक इकाई थी। एक कलंजु लगभग 4.5 ग्राम के बराबर माना जाता है। इस हिसाब से 21 कलंजु सोने का उल्लेख उस दौर में मंदिर की धार्मिक व्यवस्था के लिए किए गए दान की प्रकृति को समझने में मदद करता है।

दान के ब्याज से चलता था दैनिक चढ़ावा

ASI के एपिग्राफी विभाग के निदेशक मुनिरत्नम रेड्डी के अनुसार, शिलालेख में केवल सोना दान करने की जानकारी नहीं है, बल्कि उस दान से प्राप्त होने वाले ब्याज के उपयोग का भी विवरण दिया गया है। दान की गई राशि से मिलने वाले ब्याज का इस्तेमाल धान खरीदने और देवता को प्रतिदिन चढ़ावा अर्पित करने से जुड़ी अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जाना था।

इससे यह जानकारी मिलती है कि मंदिर की दैनिक धार्मिक गतिविधियों के लिए दान की गई संपत्ति का उपयोग एक व्यवस्थित व्यवस्था के तहत किया जाता था। सोने के दान से प्राप्त ब्याज को नियमित जरूरतों के लिए इस्तेमाल करने का उल्लेख उस समय की मंदिर आधारित आर्थिक व्यवस्था की ओर भी संकेत करता है।

मंदिर में चोल राजाओं के कई शिलालेख

वेदपुरीश्वरर मंदिर पहले से ही चोलकालीन अभिलेखों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां चोल वंश के कई राजाओं से जुड़े शिलालेख मौजूद हैं। इनमें राजा राजा चोल प्रथम के बेटे राजेंद्र चोल प्रथम से संबंधित शिलालेख भी शामिल है।

नए शिलालेख की पहचान से मंदिर का ऐतिहासिक महत्व और बढ़ गया है। पत्थरों पर दर्ज ऐसे अभिलेख तत्कालीन शासन, धार्मिक गतिविधियों, स्थानीय प्रशासन और आर्थिक व्यवस्था के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी उपलब्ध कराने वाले महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत माने जाते हैं।

एक ही मंदिर से मिले 15 नए शिलालेख

ASI के असिस्टेंट एपिग्राफिस्ट पीटी नागराजन ने बताया कि अकेले इस मंदिर से चोल राजाओं से संबंधित 15 नए शिलालेखों का रिकॉर्ड तैयार किया गया है। इनमें कुछ टूटे-फूटे शिलालेख भी शामिल हैं। इन अभिलेखों को रिकॉर्ड करने का काम ASI की ओर से चलाए जा रहे दस्तावेजीकरण अभियान का हिस्सा है।

अधिकारियों के मुताबिक, टीम केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है। नए शिलालेखों की पहचान और उनके दस्तावेजीकरण के लिए त्रिची, तंजावुर और मयिलादुथुराई जिलों के पुराने मंदिरों का भी सर्वे किया जा रहा है।

अगस्त में तमिलनाडु में 85 से अधिक नए शिलालेख दर्ज

ASI के अधिकारियों के अनुसार, अगस्त महीने में तमिलनाडु में की गई फील्ड खोज के दौरान 85 से अधिक नए शिलालेखों को रिकॉर्ड किया गया है। इन शिलालेखों की छाप यानी एस्टैम्पेज को डिजिटल रूप में सुरक्षित करने की प्रक्रिया भी चल रही है।

ASI इन पत्थर के शिलालेखों की छाप और उनसे जुड़े दस्तावेजों को ‘भारत SHRI’ पोर्टल पर उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहा है। इसका उद्देश्य ऐतिहासिक अभिलेखों को डिजिटल माध्यम से अधिक लोगों तक पहुंचाना है।

28 हजार शिलालेख ऑनलाइन करने की तैयारी

ASI के निदेशक ने बताया कि ‘भारत SHRI’ पोर्टल पर तमिलनाडु के करीब 28,000 शिलालेखों की छाप और उनके ट्रांसक्रिप्ट यानी मूल पाठ अपलोड किए जाएंगे। इससे इन ऐतिहासिक अभिलेखों तक पहुंच आसान होगी।

पोर्टल पर उपलब्ध सामग्री का उपयोग छात्र, शोधकर्ता और आम लोग मुफ्त में कर सकेंगे। इस पहल से प्राचीन शिलालेखों के अध्ययन और शोध के लिए डिजिटल संसाधन उपलब्ध होने की उम्मीद है। खास तौर पर इतिहास, पुरातत्व और दक्षिण भारत के प्राचीन राजवंशों पर अध्ययन करने वाले लोगों के लिए ऐसे अभिलेख महत्वपूर्ण स्रोत साबित हो सकते हैं।

चोलकालीन इतिहास को समझने में अहम खोज

वेदपुरीश्वरर मंदिर में मिला 1003 ईस्वी का शिलालेख चोलकालीन इतिहास के उस दौर की झलक देता है, जब मंदिर धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक जीवन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। 21 कलंजु सोने के दान और उसके ब्याज से दैनिक चढ़ावे के लिए धान खरीदने की व्यवस्था का उल्लेख उस समय की संस्थागत दान प्रणाली से जुड़ी जानकारी सामने लाता है।

ASI द्वारा किए जा रहे व्यापक सर्वे से तमिलनाडु के प्राचीन मंदिरों में मौजूद अन्य शिलालेखों की जानकारी भी सामने आ रही है। नए अभिलेखों के दस्तावेजीकरण और उन्हें डिजिटल मंच पर उपलब्ध कराने की प्रक्रिया से इतिहास के इन महत्वपूर्ण स्रोतों को संरक्षित करने की दिशा में काम आगे बढ़ रहा है।

डिजिटल मंच पर इतिहास को सुरक्षित करने की पहल

तमिलनाडु के मंदिरों में मौजूद हजारों शिलालेखों को डिजिटल रूप में उपलब्ध कराने की योजना प्राचीन अभिलेखों के संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण है। ‘भारत SHRI’ पोर्टल के माध्यम से इन शिलालेखों की छाप और मूल पाठ को ऑनलाइन उपलब्ध कराने की तैयारी की जा रही है।

मयिलादुथुराई के वेदपुरीश्वरर मंदिर में मिले राजा राजा चोल प्रथम के शासनकाल के इस शिलालेख ने चोल युग की धार्मिक और आर्थिक व्यवस्था से जुड़ी एक और कड़ी सामने रखी है। वर्ष 1003 ईस्वी में दर्ज इस अभिलेख में 21 कलंजु सोने के दान और उसके ब्याज से मंदिर की दैनिक जरूरतें पूरी करने का उल्लेख इतिहास के उस दौर की व्यवस्था को समझने के लिए महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध कराता है।