देश में महिला आरक्षण को लेकर एक बार फिर राजनीति गरमा गई है। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को लेकर जहां सरकार इसे ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसकी टाइमिंग और मंशा पर सवाल उठा रहा है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने साफ कहा है कि विपक्ष महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, लेकिन सरकार जिस तरीके से इसे लागू करना चाहती है, वह संदेह पैदा करता है। उनका आरोप है कि यह कदम महिलाओं को तुरंत अधिकार देने के बजाय राजनीतिक लाभ के लिए उठाया गया है।
विपक्षी दलों की बैठक के बाद खरगे ने कहा कि सरकार ने इस बिल को जनगणना और परिसीमन जैसी शर्तों से जोड़ दिया है, जिससे इसके लागू होने में लंबी देरी हो सकती है। उनका कहना है कि इससे महिलाओं को मिलने वाला आरक्षण अगले चुनावों में नहीं, बल्कि अनिश्चित भविष्य में टल सकता है।
वहीं, कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि महिला आरक्षण तुरंत लागू होना चाहिए, लेकिन इसे परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़ना एक “खतरनाक” कदम है। उनका तर्क है कि इससे कई राज्यों के राजनीतिक संतुलन पर असर पड़ सकता है।
क्या है पूरा विवाद?
महिला आरक्षण बिल का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करना है। लेकिन सरकार ने इसे लागू करने के लिए दो प्रमुख शर्तें रखी हैं:
- पहले देश में नई जनगणना कराई जाएगी
- उसके बाद सीटों का परिसीमन किया जाएगा
विपक्ष का कहना है कि इन प्रक्रियाओं में समय लगेगा, जिससे कानून का फायदा तुरंत नहीं मिल पाएगा।
विपक्ष के विरोध की बड़ी वजहें
1. लागू होने में देरी का डर
विपक्ष मानता है कि जनगणना और परिसीमन की शर्तें जोड़कर सरकार इस कानून को लंबे समय तक टाल सकती है।
2. ‘कोटे में कोटा’ की मांग
कांग्रेस और अन्य दल चाहते हैं कि 33% आरक्षण के भीतर ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से हिस्सा तय किया जाए, ताकि उनका प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।
3. परिसीमन पर संदेह
विपक्षी नेताओं का आरोप है कि परिसीमन प्रक्रिया का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया जा सकता है, जैसा कि पहले कुछ राज्यों में देखने को मिला।
4. दक्षिण बनाम उत्तर का संतुलन
दक्षिण भारत के राज्यों को आशंका है कि जनसंख्या आधारित परिसीमन से उनकी सीटें कम हो सकती हैं, जबकि उत्तर भारत का प्रभाव बढ़ सकता है।
सियासत के केंद्र में महिला आरक्षण
कुल मिलाकर, महिला आरक्षण को लेकर तस्वीर साफ है—विपक्ष इसके सिद्धांत के साथ खड़ा है, लेकिन लागू करने के तरीके पर सवाल उठा रहा है।
अब नजर इस बात पर है कि क्या सरकार इन आपत्तियों को दूर करेगी या यह मुद्दा संसद में एक बड़े राजनीतिक टकराव का कारण बनेगा।
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Rehan Fajal
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